रंगों में घुलती मोहब्बत

            


होलिका दहन की शाम थी। चारों ओर उत्सव का माहौल था। महल्ले के लोग एक चौराहे पर होलिका दहन की सामग्री, गोबर के उपले, लकड़ी का जलावन, सूखे हुए पेड़ की डालियाँ और धान का पुआल आदि को एक जगह जमा कर उसका ढेर बना रहे थे। कुछ लोग इस काम को करने में व्यस्त थे तो कुछ दर्शक थे। बच्चों की टोलियाँ भी उछल-कूद मचाकर खेलने में मस्त थे। जैसे-जैसे समय बीत रहा था, एक-एककर लोग वहाँ जमा हो रहे थे। थोड़ी देर में ही होली गाने-बजाने वालों की टोली भी वहाँ ढोल-मजीरे के साथ आ गए। एक तरफ महिलाओं का झुंड भी अपने अपने घरों से निकलकर इकट्ठा हो गईं थी। कुछ ही देर में उस ढेर में आग लगाया जाना था। उसके बाद गाना-बजाना होता, शेरों-शायरी का दौर चलता। एक दूसरे के ऊपर शायराना अंदाज़ में ही वार किए जाते, जैसा कि हर साल होता आया है। उसके बाद रंगों का त्यौहार होली, जो अबसे कुछ ही घंटों की दूरी पर था जिसका हर कोई पिछले साल से ही बेसब्री से इंतजार कर रहा था।


इन्हीं लोगों के बीच था प्रणय और महिलाओं के समूह के साथ एक लड़की भी थी, जिसका नाम परी था। प्रणय और परी दोनों बचपन से एक साथ खेले थे, एक ही स्कूल में पढ़े थे और महल्ले की गलियों में एक-दूसरे के साथ अनगिनत शरारतें भी की थीं। लेकिन जब बड़े हुए, तो उनके बीच एक अनकहा अहसास भी पनपने लगा था। स्कूल की छुट्टियों में जब वे स्कूल के सामने के आम के बगीचे में झूला झूलते, तो जब प्रणय उसे हल्का सा धक्का देकर चिढ़ाता और तब परी उसे गुस्से में झूठ-मूठ के मारने का नाटक करती। कभी किसी उत्सव में दोनों की नजरें अचानक टकरा जातीं और फिर हंसी में बदल जातीं। धीरे-धीरे, उनके बीच की मासूम दोस्ती एक अनकही मोहब्बत में बदल रही थी, जिसका एहसास शायद उन्हें खुद भी ठीक से नहीं था।

        


प्रणय एक हंसमुख, नटखट और होशियार लड़का था। उसे होली का त्योहार बेहद पसंद था, खासकर रंगों से खेलना, लोगों को गुलाल लगाना उसे अच्छा लगता था। दूसरी ओर, परी शांत स्वभाव की लड़की थी, जो रंगों से ज़्यादा भीगने और गीले कपड़ों से बचने में विश्वास रखती थी। हर साल होली के दिन प्रणय इसी फ़िराक में रहता था कि किस प्रकार उसे रंग लगाया जाए। वह उसे रंगने की पूरी कोशिश करता, परन्तु परी चतुराई से बच निकल जाती थी।


इस बार होली पर प्रणय ने कुछ खास करने की ठानी थी। उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर योजना बनाई कि वह परी को सबसे पहले रंग लगाएगा। लेकिन उधर परी ने भी सोच लिया था कि इस बार वह प्रणय को सबक सिखाएगी।


होलिका दहन के बाद जब सभी लोग अपने-अपने घर को लौट चुके थे तब परी ने अपनी सहेलियों से कहा, "इस बार प्रणय को होली के दिन सबक सिखाएँगे। हम उसे वैसे ही रंग लगाएँगे, जैसे वह हमें रंगने का सपना देख रहा है।"


सहेलियाँ हंस पड़ीं और योजना को अमल में लाने की तैयारी करने लगीं। उसकी सहेली नंदिनी ने उत्सुकता से पूछा, "कैसे?"


परी ने शरारती मुस्कान के साथ कहा, " इस बार मैं उसे ऐसा रंग लगाऊंगी कि वह सोच भी नहीं सकता। कल सुबह हम सब मिलकर उसके घर के सामने घात लगाकर रहेंगे। जैसे ही वह घर से बाहर निकलेगा, हम उस पर रंग और पानी की बौछार कर देंगे। और हाँ, सबसे पहले गुलाबी रंग से शुरुआत करेंगे, क्योंकि वह सबसे ज़्यादा उसी से चिढ़ता है!"

        


सुबह होली का दिन था। महल्ले की सड़कें और गलियाँ गुलाल से रंगीन हो चुकी थीं। ढोल-नगाड़ों की आवाज़ गूंज रही थी। बच्चे पिचकारियाँ लिए इधर से उधर दौड़ रहे थे, धूम मचा रहे थे  और हर ओर अबीर-गुलाल की वर्षा हो रही थी।


उधर प्रणय की टोली भी तैयार थी। उसने अपने दोस्तों से कहा, "आज परी को हमसे कोई नहीं बचा सकता। हमें उसे अच्छे से रंग में रंगना ही होगा।"


परन्तु जब वह परी के घर के पास पहुँचा, उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसने देखा कि परी पहले से ही अपने आंगन में, अपने हाथ में रंग से भरी बाल्टी लिए खड़ी है। जैसे ही प्रणय ने कदम बढ़ाया, परी ने झट से बाल्टी का सारा रंग उसके ऊपर उड़ेल दिया। प्रणय हक्का-बक्का रह गया, उसकी पूरी टोली हंस पड़ी। परी खिलखिलाई, "कैसा लगा सरप्राइज़, रंगबाज जी?"


प्रणय ने मुस्कुराते हुए कहा, "बिलकुल मज़ेदार, लेकिन होली अभी खत्म नहीं हुई है, परी। अब मेरी बारी है!"


पूरे महल्ले की सड़कें रंग और पानी से भीग चुकी थीं, और हर कोई मस्ती में झूम रहा था। प्रणय की बात सुनकर परी भागने लगी, वह भी उसके पीछे-पीछे भागने लगा। उसके हाथ में एक पिचकारी थी और वह परी के पीछे दौड़ रहा था। परी दौड़ती जा रही थी, लेकिन आखिरकार प्रणय ने उसे पकड़ ही लिया। तब तक प्रणय के दोस्त और परी की सहेलियाँ भी वहाँ इकठ्ठा हो गए। सबने मिलकर एक-दूसरे को रंग लगाया और इस दौरान उनकी हंसी और मस्ती पूरे गाँव में गूंज रही थी।


जब प्रणय परी के गालों में गुलाल मल रहा था तब अचानक परी को प्रणय के स्पर्श में एक प्यार भरी कोमलता महसूस हुआ।  जो सिर्फ रंगों की नहीं, बल्कि उसके भावनाओं की भी थी। परी की धड़कनें तेज़ हो गईं थीं। एकबार गुलाल लगा देने के बाद भी प्रणय ने फिर से थोड़ा सा गुलाल लिया और उसके चेहरे पर हल्के हाथों से लगा दिया और फिर उसने कहा, "अब मेरी होली पूरी हुई।"


परी ने शरमा कर आँखें झुका लीं। प्रणय ने धीरे से कहा, "हर साल की होली में हम एक दूसरे को रंग लगाने के चक्कर में भागते ही रह जाते हैं,  मगर इस बार मुझे तुमसे कुछ कहना है। कहना तो कबसे मैं तुम्हें चाह रहा था पर कह नहीं पा रहा था।"


परी ने चौंक कर उसकी ओर देखा। प्रणय ने मुस्कुराते हुए कहा, "तुम मेरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत रंग हो। क्या तुम हमेशा के लिए मेरी होली की रंगत बनना पसंद करोगी?"


परी एक पल को ठिठक सी गई। उसे समझ नहीं आया कि प्रणय को वह क्या जबाब दे। उसकी आँखों में चमक आ गई। उसने शरारत भरी मुस्कान से गुलाल उठाया और प्रणय के चेहरे पर मलते हुए बोली, "अगर तुम हमेशा मेरे चेहरे पर ऐसे ही मुस्कान लाते रहोगे, तो ज़रूर मैं तुम्हारी होली की रंगत बनना पसंद करुँगी।"


वातावरण में चारों ओर रंग ही रंग उड़ रहे थे। रंगों के गुबार से पूरा आसमान भरा लग रहा था। होली के उमंग में कहीं  ढोलक की थाप सुनाई दे रही थी  और कहीं दूर से होली के गीतों की आवाज, मन में एक नई मिठास घोल रही थी।


तभी परी ने मुस्कुराते हुए कहा, "लेकिन प्रणय, मुझे तुम्हें भी एक बात बतानी थी।"


प्रणय ने चौंककर पूछा, "क्या?"


परी ने हँसते हुए गुलाल मलते हुए कहा, "अगर तुम हर बार होली पर मुझे ऐसे ही पकड़ोगे, तो मुझे हर साल भागने में और मज़ा आएगा!"


दोनों खिलखिला उठे, और गाँव वालों ने इस नई जोड़ी पर अबीर की बौछार कर दी। उस दिन, होली के रंगों ने दो दिलों को हमेशा के लिए एक कर दिया।

 

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