प्यार की सौगात - सिर्फ दिलों का रिश्ता नहीं

सुमित Bsc द्वितीय वर्ष का एक मेधावी छात्र था, उसे किताबों से गहरा लगाव था। पर वह गंभीर और शांत स्वभाव का लड़का था। उसे किसी और चीज से कोई मतलब नहीं था। वह सिर्फ अपने से ही मतलब रखता था। वह प्रायः कॉलेज के पुस्तकालय में बैठकर पढाई किया करता था। दूसरी तरफ आरोही बड़े ही चंचल स्वाभाव की थी। उसने अभी-अभी प्रथम वर्ष Bsc में कॉलेज ज्वाइन किया था। वह पढ़ाई में अव्वल होने के साथ-साथ एक खुशमिजाज किस्म की लड़की भी थी।

        


एक दिन पुस्तकालय में छात्रों की संख्या ज्यादा होने से बैठने की जगह कम पड़ रही थी। सुमित अन्य छात्रों के साथ वहाँ पहले से ही बैठा हुआ था। थोड़ी देर बाद  आरोही भी अपने कुछ दोस्तों के साथ वहाँ आ पहुँची। पुस्तकालय में भीड़ तो पहले से ही थी। उसे और उसकी दोस्तों को बैठने की जगह नहीं मिल पा रही थी। उसने अपने दोस्तों से कहा, ”चलो यार चलते हैं, आज शायद हम देर हो गए। इसलिए जगह भर गई है। हम फिर कभी आ जाएँगे।“


आरोही की खनकती आवाज को सुनकर सुमित का ध्यान भंग हुआ। उसने अपने डेस्क पर जगह बनाते हुए आरोही को बैठने का ऑफर दिया, “आप चाहें तो यहाँ बैठ सकती हैं।“ आरोही सुमित का प्रपोजल ठुकरा न सकी और सुमित के साथ उसके बेंच पर बैठ गयी। उसने अपने दोस्तों से भी किसी तरह एडजस्ट कर बैठ जाने को कहा। उसके साथ आई हुई लडकियाँ औरों के साथ एडजस्ट कर बैठ गयी।


सुमित और आरोही के बीच की यह छोटी-सी मुलाकात जल्द ही रोज़ की मुलाकातों में बदल गई। दोनों के बीच पढ़ाई और विचारों का आदान-प्रदान होने लगा। सुमित की गंभीरता और आरोही की चंचलता एक-दूसरे को आकर्षित करने लगी।


दोनों का मिलना अब नियमित हो गया था। कभी-कभी दोनों कॉलेज की कैंटीन में चाय पर चर्चा करते, तो कभी लाइब्रेरी में घंटों एक ही टेबल पर बैठकर पढ़ाई करते। आरोही को सुमित की ईमानदारी और शांत स्वभाव बहुत भाता, जबकि सुमित को आरोही की उत्साही और हंसमुख प्रवृत्ति ने बहुत प्रभावित किया।


एक दिन जोरदार बारिश हो रही थी और कॉलेज की छुट्टी हो गई थी। आरोही के पास छाता नहीं था, और वह बाहर खड़ी बारिश के रुकने का इंतजार कर रही थी। ठीक उसी वक्त सुमित भी वहाँ पहुँचता है। उसने देखा कि आरोही वहाँ बस का इंतजार कर रही थी। उसने धीरे से अपना छाता उसकी ओर बढ़ाया और कहा, "अगर तुम चाहो तो इसे ले सकती हो, तुम्हें घर तक पहुँचना होगा।"


आरोही ने मुस्कुराकर कहा, "अगर तुम भी मेरे साथ चलो तो ज्यादा अच्छा रहेगा।"


सुमित थोड़ी हिचकिचाहट के बाद हामी भर दी। तभी उनकी बस आ गयी। दोनों के रास्ते एक ही थे, मगर सुमित को आरोही से कुछ दूर आगे जाना था। रास्ते में दोनों ने खूब बातें कीं – किताबों से लेकर जिंदगी तक, सपनों से लेकर हकीकत तक। यही वह दिन था जब दोनों को एहसास हुआ कि उनके बीच कुछ खास जुड़ाव है।


समय बीतता गया, और दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता बनने लगा। सुमित की आंखों में आरोही के लिए सम्मान था, और आरोही भी सुमित की ईमानदारी को पसंद करने लगी थी। मगर दोनों ने कभी खुलकर अपने मन की बात एक दूसरे से नहीं कही।


सुमित के कॉलेज की पढ़ाई का अंतिम वर्ष आ चुका था। उसके परीक्षा की तैयारियाँ जोरों पर थीं। एक दिन आरोही ने सुमित को कैंपस की सबसे ऊँची छत पर बुलाया। शाम का समय था, सूरज धीरे-धीरे अस्त हो रहा था और ठंडी हवा चल रही थी।


आरोही ने धीरे से कहा, "सुमित, तुम्हारा यह अंतिम वर्ष है। तुम्हारी परीक्षा हो जाएगी और तुम अपने घर को लौट जाओगे। फिर हम शायद कभी ने मिलें। परन्तु हम दोनों के पास एक दूसरे का नंबर तो है। हम आपस में फ़ोन पर बातें कर सकते हैं। मगर कुछ चीज़ें जो केवल महसूस की जा सकती हैं, जिन्हें शब्दों में ही बयाँ कर पाना मुश्किल होता है, उसे हम फोन पर नहीं कर सकते।"


सुमित ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, "शायद इसलिए कि कुछ भावनाएँ शब्दों की मोहताज नहीं होतीं।"

  


     

दोनों की आँखें एक-दूसरे से मिलीं, लेकिन फिर आरोही ने नजरें झुका लीं। तभी कॉलेज में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ, जिसमें आरोही ने शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत किया। सुमित उसकी कला से बहुत प्रभावित हुआ। कार्यक्रम के बाद जब उसने आरोही की तारीफ़ की, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी। आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "तारीफ़ के लिए धन्यवाद, लेकिन तुम्हारी नज़रों में जो सम्मान दिखता है, वही मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।"


वह रात सुमित के लिए बहुत खास थी। उसने पहली बार महसूस किया कि आरोही उसकी जिंदगी में कितनी महत्वपूर्ण हो गई है। उसे अब इस एहसास को नाम देने की जरूरत महसूस होने लगी थी।


सुमित और आरोही का रिश्ता गहराने लगा। लेकिन उनकी सामाजिक पृष्ठभूमियाँ अलग थीं। सुमित एक मध्यमवर्गीय परिवार से था, जहाँ अनुशासन और पारिवारिक परंपराओं का सख़्ती से पालन होता था, जबकि आरोही एक उच्च-मध्यम वर्गीय परिवार से थी, जहाँ सोच थोड़ी आधुनिक थी।


जब उनके परिवारों को इस दोस्ती की भनक लगी, तो चिंता की लहर दौड़ गई। आरोही के माता-पिता को यह मंजूर नहीं था कि उनकी बेटी एक साधारण परिवार के लड़के से कोई रिश्ता रखे। दूसरी ओर, सुमित के माता-पिता को डर था कि कहीं यह रिश्ता उनके पारिवारिक मूल्यों पर प्रभाव न डाले।


आरोही के पिता एक प्रतिष्ठित व्यवसायी थे, जो चाहते थे कि उनकी बेटी किसी संपन्न परिवार में विवाह करे। उन्हें यह भय था कि सुमित की साधारण आर्थिक स्थिति कहीं उनकी बेटी के सुखद भविष्य में बाधा न बने। दूसरी ओर, सुमित के माता-पिता यह सोचकर चिंतित थे कि क्या आरोही उनके परिवार के रीति-रिवाजों और मूल्यों को अपना सकेगी।


इस तनाव के कारण दोनों परिवारों ने सुमित और आरोही को मिलने से मना कर दिया। कई बार आरोही को उसके माता-पिता ने समझाने की कोशिश की कि यह रिश्ता समाज के लिए उपयुक्त नहीं है। सुमित के घर भी कई बार पारिवारिक चर्चाएँ हुईं, जहाँ उसके माता-पिता ने उसे अपने करियर पर ध्यान देने की सलाह दी।


समाज और परिवार की इन चुनौतियों के बावजूद, दोनों ने धैर्य और समझदारी से स्थिति को संभालने का निश्चय किया। वे जानते थे कि केवल भावनाओं से ही नहीं, बल्कि मेहनत, ईमानदारी और समय के साथ वे अपने परिवारों का विश्वास जीत सकते हैं।

    


परिवार और समाज की कठिनाइयों के बावजूद, सुमित और आरोही ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने रिश्ते को मर्यादाओं के भीतर रहकर निभाने का निश्चय किया। सुमित ने अपने करियर पर ध्यान केंद्रित किया और कड़ी मेहनत से प्रशासनिक सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर एक सम्माननीय पद प्राप्त किया। वहीं, आरोही ने भी अपने माता-पिता की इच्छानुसार अपनी पढ़ाई पूरी की और अपने नृत्य के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई।


समाज में कई बार लोगों ने सवाल उठाए, लेकिन जब उन्होंने सुमित और आरोही की उपलब्धियों को देखा, तो धीरे-धीरे विरोध के स्वर कम होने लगे। आरोही के माता-पिता भी यह समझ गए कि केवल धन-दौलत से नहीं, बल्कि सच्चे रिश्तों से जीवन संवरता है। अंततः, उन्होंने इस रिश्ते को अपनाने का निर्णय लिया।


सुमित और आरोही ने अपने प्रेम को केवल भावनाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने अपने रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए मेहनत, सम्मान और विश्वास का मार्ग अपनाया। उनका संघर्ष केवल उनका व्यक्तिगत संघर्ष नहीं था, बल्कि यह समाज के लिए भी एक संदेश था कि प्रेम का आधार केवल भावनाएँ नहीं, बल्कि परिश्रम, ईमानदारी और पारिवारिक मूल्यों की समझ भी होता है।


आखिरकार, समाज और परिवार की सहमति से सुमित और आरोही का विवाह हुआ। यह विवाह सिर्फ दो लोगों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन था। उन्होंने यह साबित किया कि प्यार सिर्फ दिलों का रिश्ता नहीं, बल्कि संस्कारों और मूल्यों की सौगात भी हो सकता है।


उनकी प्रेम कहानी आज भी उनके शहर में एक मिसाल बनी हुई है, जो यह सिखाती है कि अगर प्रेम सच्चा हो और उसमें सम्मान और धैर्य हो, तो कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती।

 

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