
आँखो से जब अश्क गिरा, कोई दर्द छुपा रखा दिल में।
बैठी क्यों हो खामोश प्रिय हे, रंगीली इस महफिल में।
हाल बता देती कभी अपना, तब शायद कुछ कर पाता।
साथी बनालो लंबा सफर है, कोई न मिलेगा मंजिल में।
दिल का दरिया उफन रहा है, साहिल नजर नहीं आता।
जब दिल में है गुबार भरा, तब मन को कोई नहीं भाता।
नाव खड़ी मझधार में हो और वाकिफ न हो दरिया से।
कैसे पार उतर पाएँगे, जबतक माँझी नहीं मिल जाता।
प्यार बुरा होता न कभी, जब नीयत में कहीं खोट न हो।
महसूस न होता है तबतक, जबतक दिल पर चोट न हो।
दर्द भी तब गहरा होता है, अपने खुद जख्म जब देते हैं।
जख्म को दे कोई छुप न पाए, जबतक कोई ओट न हो।
तुष्टिकरण की नीति पर, चलकर कल्याण नहीं होगा।
जब भेद करोगे जन-जन में, पूरा अरमान नहीं होगा।
प्रतिनिधि न हो खास वर्ग के, हो तुम सारी जनता के।
वर्गों में जब बाँटोगे, किसी का भी उत्थान नहीं होगा।
शासन की एक नीति होती है, उसका धर्म नहीं होता।
सबके हित की नीति न हो, हितकारी कर्म नहीं होता।
जब पथ से विचलित हो शासन, खुशहाली न होती है।
कठोर सजा पाता वह शासक, जनता नर्म नहीं होता।
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