गाँव में जब यह खबर फैली कि ठाकुर साहब ने अपनी बेटी राधा की शादी एक साधारण घर के युवक से कर दी है, तो पूरे गाँव में हलचल मच गई। शादी, लव मैरिज नहीं बल्कि अरेंज मैरिज थी। दोनों के माँ-बाप की मर्जी से हुई थी। लव मैरिज होती तो शायद लड़का और लड़की दोनों के ऊपर माँ-बाप, परिवार और समाज के लोग ढेरों इल्जाम लगाते, ताने देते, माँ-बाप और परिवार के नाक का सवाल बनाते, परन्तु ऐसा मौका किसी को नहीं मिला। फिर भी लोगों का क्या, वे तरह-तरह की बातें बनाने लगे।
"बेटी
में जरूर कोई खोट होगा," किसी
ने कहा।
"शायद
लड़के ने जादू-टोना कर दिया हो," दूसरा बोला।
लेकिन सच तो कुछ और ही था। राधा ठाकुर साहब की बेटी थी। वह जितना सुन्दर थी, उतना ही सुशील और साफ़ दिल की लड़की थी। माँ-बाप के साथ-साथ वह परिवार, समाज और गाँव की भी लाडली बेटी थी। राधा के माता-पिता ने अपनी बेटी की शादी अच्छे घर-वर के बजाय एक साधारण घर के युवक अमित से इसलिए की थी क्योंकि उन्हें उसमें सच्चाई, मेहनत और ईमानदारी दिखाई दी थी।
शादी
के दिन राधा को सजाया गया तो वह किसी परी जैसी लग रही थी। जब बारात पहुँची,
तो पूरे गाँव के लोग यह देखने आए कि
इतनी सुंदर और संस्कारी लड़की को इस गरीब घर में किस मजबूरी में ब्याह दिया गया है।
बारात आई, शादी हुई और लड़की को उसके घरवालों ने विदा किया। औरों के माँ-बाप की तरह उसके भी माँ-बाप भी उसके विदाई के समय फूट-फूटकर रोए। वह बेटी अपने माँ-बाप की दुलारी थी। बड़े नाजों से उसे पाला गया था। विदा होकर जब वह अपने पति के साथ ससुराल पहुँची तो उसके ससुराल वाले उसकी सुन्दरता देखकर ही दंग रह गए। सबके जुबान पर एक ही बात थी कि “क्या यह लड़की इस घर में रह पायेगी जहाँ के दीवारों पर पक्की छत भी नहीं है। एक सुन्दर, सुशील और कमाऊ लड़के की शादी उसके माँ-बाप ने किस आधार पर इतने बड़े परिवार में कर दिया। यह लड़की तो इस परिवार में कभी सामंजस्य बिठा ही नहीं पाएगी।” जितनी मुँह उतनी बातें।
ससुराल
पहुँचने पर राधा ने अपने आसपास का माहौल देखा — घर पुराना था, छत से पानी टपकता था और रोजमर्रा की
जरूरतें भी मुश्किल से पूरी होती थीं। राधा के मन में सवाल उठे, "क्या मैं यहाँ रह पाऊँगी? क्या मैं इस घर को संवार पाऊँगी?"
राधा
को यह देखकर झटका लगा, लेकिन
उसने अपने माँ-बाप के फैसले को आदर के साथ स्वीकार किया। उसकी माँ ने उसे विदा
करते हुए समझाया था,
"बेटी,
घर की समृद्धि दीवारों और छत से नहीं,
प्यार और मेहनत से आती है। तुम्हें अपने
पति का साथ देना है और अपना घर सजाना है।"
राधा
ने माँ की बात गांठ बांध ली।
अगले
ही दिन सुबह राधा ने घर के कामों को अपने हाथ में लिया। उसने घर में सफाई की,
चीजों को व्यवस्थित किया और रसोई को
अच्छे से संभाला। अमित जब काम पर जाने लगा, तो राधा ने उसे रोकते हुए कहा,
"आपको
टिफिन साथ ले जाना चाहिए, खाली
पेट काम में मन नहीं लगेगा।"
अमित
मुस्कुराया और बोला, "तुम
इतनी जल्दी सब संभाल लोगी, मैंने
सोचा नहीं था।"
धीरे-धीरे
राधा ने न सिर्फ घर को सँवारा, बल्कि
अमित के काम में भी हाथ बँटाने लगी।
एक
दिन अमित ने चिंतित स्वर में कहा, "राधा, मेरा
काम तो चल रहा है, पर
इतने पैसों में घर ठीक करवाना मुश्किल है।"
राधा
ने मुस्कुराते हुए कहा, "हम
दोनों मिलकर कोशिश करेंगे, धीरे-धीरे
सब ठीक हो जाएगा।"
राधा
ने अपने हुनर का उपयोग किया और घर में सिलाई का काम शुरू किया। उसकी सिलाई इतनी
अच्छी थी कि गाँव के लोग उसके पास ही कपड़े सिलवाने आने लगे। राधा ने अपनी आमदनी
से घर में जरूरत की चीजें खरीदनी शुरू कीं। अमित भी अपनी मेहनत से दुकान को बड़ा
करने में सफल हुआ।
धीरे-धीरे
अमित का कारोबार बढ़ने लगा। छोटी-सी दुकान अब एक बड़ी परचून की दुकान में बदल गई।
दोनों की मेहनत रंग लाई और घर में सुख-समृद्धि आने लगी। पुराने खपरैल के घर की जगह
पक्की छत बन गई। राधा का सादगी भरा प्यार और अमित की ईमानदार मेहनत ने उनके जीवन
को संवार दिया।
अब
वह घर जो कभी कच्ची दीवारों और तंगहाली का प्रतीक था, अब गाँव के समृद्ध घरों में गिना जाने
लगा। गाँववाले भी कहते, "इस
घर में नई बहू के कदम पड़ते ही इनके दिन बदल गए।"
एक
दिन राधा के माता-पिता उनसे मिलने आए। उन्होंने जब बेटी का खुशहाल जीवन देखा तो
उनकी आँखों में आँसू आ गए। राधा के माता-पिता ने अमित के कंधे पर हाथ रखकर कहा,
"तुमने
मेरी बेटी को जितना प्यार और सम्मान दिया, उससे साबित होता है कि हमने अपना फैसला सही लिया था।"
राधा
और अमित ने अपनी मेहनत से यह साबित कर दिया कि किस्मत चाहे जैसी भी हो, उसे कर्मों के बल पर बदला जा सकता है।
प्यार, विश्वास और मेहनत से
हर सपने को साकार किया जा सकता है।
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