“माँ, जल्दी करो. बारात आनेवाली ही होगी.” रेणु ने अपनी माँ मालती से कहा.
पड़ोस में रहने
वाली डॉ सिन्हा की बेटी मीनाक्षी की आज शादी है. जो उसकी सबसे अच्छी दोस्त भी है. रेणु
के पिता वर्मा जी और डॉ सिन्हा पडोसी होने के नाते अच्छे दोस्त भी हैं. मीनाक्षी
जो पेशे से एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर भी है, उसकी शादी अपने दोस्त मुकेश से हो रही है
जो खुद एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है. मीनाक्षी और मुकेश दोनों एक दूसरे को बड़े अच्छे
से जानते हैं. दोनों साथ-साथ एक ही इंस्टीट्यूट से पास आउट हैं.
रेणु और मीनू,
मालती और वर्मा जी की संतान हैं. रेणु बड़ी है और मीनू छोटी. रेणु ग्रेजुएशन
कम्पलीट कर चुकी है और मीनू अभी-अभी ग्रेजुएशन में गयी है. रेणु की पढाई समाप्त हो
चुकी है. वह घर में ही रहकर competitive exam की तैयारी भी कर रही है और साथ ही साथ घर के कामों में माँ
की मदद भी कर रही है. वर्मा जी भी रेणु की शादी करने की सोंच रहे हैं, परन्तु उन्हें अभी तक योग्य और रेणु के अनुकूल लड़का नहीं
मिला है.
“अरे, अभी तो दिन ही ढले हैं. इतनी जल्दी बारात कैसे आ सकती है.
बारात के आते-आते रात के नौ-दस तो बज ही जाएँगे.” मालती ने रेणु से कहा.
“माँ! मैं
जानती हूँ कि बारात के आते-आते दस तो बज ही जाएँगे. फिर भी हमें जल्दी जाना चाहिए.
उनको हमारी जरूरत हो सकती है और वैसे भी मीनाक्षी को ब्यूटी पार्लर ले जाने की
जिम्मेदारी मेरी ही है.”
मालती अभी भी
तैयार नहीं हो पाई थी. वह घर के कामों में ही उलझ कर रह गई थी. उन्होंने रेणु से
कहा, “ अगर तुम्हे जाना है तो तुम तैयार होकर निकल
जाओ. मैं मीनू के साथ आ जाऊँगी.”
“ठीक है माँ.
मुझे दस मिनट और लगेगा. मैं निकल जाती हूँ और आप मीनू के साथ आ जाईएगा.”
दस मिनट बाद
रेणु तैयार होकर माँ से आज्ञा लेकर निकल जाती है. “माँ मैं जा रही हूँ.” थोड़ी ही
देर में वह मीनाक्षी के घर पहुँच जाती है. वह रेणु का ही इन्तजार कर रही होती है.
“अरे यार! बहुत
देर कर दी. मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रही हूँ.” मीनाक्षी ने बनावटी गुस्से से
कहा.
“ओ..हो..हो.
बड़े व्यग्र हो रही हो. चिंता मत करो, बारात के आने
से पहले ही हम लौटकर वापस आ जाएँगे.” रेणु ने कटाक्ष करते हुए कहा.
गाडी आई. किसी
ने उनदोनों को इसकी सूचना दी. वे दोनों गाड़ी में बैठकर ब्यूटी पार्लर के लिए चल
दिए. कुछ देर बाद मीनाक्षी सज-संवरकर रेणु के साथ आती है और सीधा अपने कमरे में ही
चली जाती है.
कुछ देर बाद
बाहर गाजे-बाजे की शोर सुनाई देती है. बच्चे शोर मचाते हैं “बारात आ गई, बारात आ गई.” सबके मन में बारात को देखने की उत्सुकता
जागृत होती है. मीनाक्षी के मन में अन्दर ही अन्दर फुलझरी फूटने लगती है. अबतक तो
मुकेश उसका एक अच्छा दोस्त था परन्तु अब वह कुछ ही पलों में उसका जीवन साथी बनने
वाला है. अग्नि के सात फेरे लेने के बाद दोनों एक दूसरे के सदा के लिए हो जायेंगे.
वह अपने सुन्दर भविष्य की कल्पना करने लगती है. तभी बारात दरवाजे तक पहुँच जाती
है. कुछ रस्म पूरी की जाने लगी और कुछ की तैयारी होने लगी. दरवाजे पर बारात का
स्वागत किया गया. सभी बाराती अपना-अपना स्थान ग्रहण कर चुके. उनके सामने नाश्ता
परोसा जाने लगा. नाश्ता करने के बाद माला फेर करने के रस्म की तैयारी की जाने लगी.
वह समय भी आ
गया जब मीनाक्षी रेणु और अपनी अन्य सहेलियों के साथ माला फेर कार्यक्रम के लिए
स्टेज पर आ गयी. मुकेश जो अबतक शादी वाली कुर्सी पर बैठा था मीनाक्षी और सहेलियों
के आते ही उठकर खड़ा हो जाता है. उसकी सहेलियों के हाथ में मालाओं की थाली होती है
जिसमें दो मालाएँ रखी होती है. मीनाक्षी और मुकेश दोनों थाली से एक-एक माला
निकालकर एक दूसरे के गले में डाल देते हैं. वातावरण में तालियों की गरगराहट और
पटाखे की आवाज सुनाई देने लगती है. मुकेश का दोस्त सुरेश जो कि स्टेज पर उसके साथ
ही होता है, उसकी नजर रेणु के ऊपर ही जाकर अटकती है. वह उसे
एक ही नजर में पसंद कर लेता है. परन्तु दूसरी तरफ रेणु की बहन मीनू की नजर सुरेश
पर ही होती है. माला फेर के उपरांत सभी लडकियाँ मीनाक्षी को लेकर पुनः आँगन की तरफ ले जाती है.
पिंकी मीनू से
कहती है, ”लगता है तुम्हारा दिल पर उसपर आ गया है.”
“हाँ यार! अगर
मौका मिले तो उसे हाथ से जाने न दूँ.” पिंकी से मीनू कहती है.
“पर अभी तो
तुम्हारा नम्बर आने में देर है. तुमसे पहले तो रेणु दी का नंबर है. तुम्हें अभी
इन्तजार ही करना होगा. तबतक चिड़िया तुम्हारी डाल से उड़ चुकी होगी और तुम देखती ही
रह जाओगी. इसलिए अभी अपने आपको कंट्रोल करना सीखो.”
“हाँ यार! कहती
तो तुम ठीक ही हो. पर दिल है कि मानता नहीं. मेरा दिल तो उस लड़के पर आ गया है. कुछ
भी हो मैं उसके बारे में पता तो जरूर करुँगी.”
मीनू जबतक
सुरेश के बारे में कुछ भी पता करती, एक दिन अचानक
सुरेश अपने पिताजी को लेकर उसके घर पहुँच जाता है. दरवाजे पर नौक करता है. दरवाजा मीनू खोलती है. सुरेश को
देखकर उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता. वह अन्दर ही अन्दर काफी खुश हो रही होती
है और एकटक सुरेश की तरफ ही अचंभित होकर देख रही होती है. उसे इस तरह देखते हुए
देखकर सुरेश कुछ नर्वस हो जाता है.
“सुनिए.” सुरेश
कहता है.
“जी कहिये.”
मीनू के मुँह से अचानक निकलता है.
“क्या हम अन्दर
आ सकते हैं? ये हमारे पापा श्री महेश हैं और मेरा नाम सुरेश है. हम आपके पिताजी से
मिलकर कुछ बात करना चाहते हैं.”
“जी, आईए न.”
मीनू राह छोड़ते हुए आवाज लगाती है, “पापा! पापा! आपसे कोई मिलने आए है.”
“अभी आया.”
अन्दर से वर्मा जी की आवाज आती है. वर्मा जी बाहर आते हैं. उन्हें आश्चर्य होता
है. वे उनलोगों से परिचित नहीं है. फिर ये कौन लोग हैं जो बिना पूर्व सूचना के ही
उनके दरवाजे तक आ गए.
वर्मा जी को
विस्मित देखकर सुरेश के पिता हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं. “ जी, मेरा नाम महेश है और यह मेरा बेटा सुरेश है. यहीं एक
कम्पनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है. हमें आपसे मिलकर कुछ जरूरी बात करनी है.”
वर्मा जी भी
दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते करते हैं. “ अरे! आईए न.” दोनों को लेकर बैठक में पहुँचते
हैं. दोनों से अपना आसन ग्रहण करने को कहते हैं. अन्दर रखे सोफे पर दोनों बैठ जाते
हैं. कुछ देर बाद मीनू दोनों के लिए चाय - पानी और कुछ स्नैक्स लेकर आती है.
वर्मा जी महेश
जी से चाय का आग्रह करते हैं. चाय पीते हुए महेश जी कहते हैं, “ वर्मा जी क्षमा
करें, हम आपस में एक दूसरे से परिचित तो नहीं हैं फिर
भी हम इधर से ही गुजर रहे थे तो सोंचा कि आपलोगों से एक बार मिलता चलूँ.”
“मैं आपसे सीधी
बात ही करना चाहता हूँ. जैसा कि मैंने आपसे कहा कि यह मेरा बेटा सुरेश है जो एक
सॉफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर है. अभी कुछ दिन पहले हम अपने पडोसी के बेटे मुकेश
की शादी में बाराती बनकर सिन्हा जी के घर आए थे. मुकेश और सुरेश दोनों आपस में
अच्छे दोस्त हैं. वहीँ इसने वरमाला के समय आपकी बेटी रेणु को देखा. रेणु इसे बहुत
पसंद आई. इसलिए अपने बेटे की शादी का प्रस्ताव लेकर आपके पास आये हैं. अगर आपको
कोई एतराज न हो तो.”
“हमारा
अहोभाग्य कि आप हमारे घर आए. परन्तु शादी – ब्याह का निर्णय अचानक से नहीं लिया जा
सकता है. इसलिए हमें इसपर विचार करने के लिए कुछ समय चाहिये.” वर्मा जी ने कहा.
“हाँ, हाँ. आप
आराम से सोंच विचार कर लीजिये. अगर और किसी प्रकार की कोई जानकारी मुझसे चाहिए तो
आप बेशक पूछ सकते हैं, हमें कोई तकलीफ नहीं होगी. या फिर आप किसी अन्य स्रोत से
कुछ ज्ञात करना चाहते हैं तो वह भी कर सकते हैं. हम आपका इंतजार करेंगे.” महेश जी
ने कहा.
“अच्छा, अब
हमें इजाजत दें.” चाय का प्याला वापस टेबल पर रखते हुए महेश जी जाने के लिए उठ खड़े
हुए. महेश जी अपने बेटा सुरेश को लेकर वहाँ से निकल गए. उनके वहाँ से जाते ही मीनू
काफी उदास हो गई. उसने सोंचा कि जिसकी मूरत उसने अपने दिल में बिठा रखी है, उसकी
पसंद तो वह नहीं बल्कि उसकी बहन रेणु है. अब उसे अपनी ही
बहन रेणु से इर्ष्या होने लगी. उसे अपनी आँखों के सामने ही अपने सपने टूटते हुए
दिखने लगे. परन्तु वह यह समझ नहीं पा रही थी कि अब वह क्या करे. उसके यह
सोंचते-सोंचते ही सुबह से शाम और शाम से रात हो गई. वह उदास मन लिए चुपचाप सो गई.
माँ ने कई बार उसे खाना खाने के लिए उठाने की कोशिश की. परन्तु वह भूख न होने का
बहाना करके सोई रही. अगली सुबह वह जल्दी उठी और तैयार होकर कॉलेज चली गई.
कॉलेज में उसकी
दोस्त पिंकी उसका इंतजार कर रही थी. उसे देखते ही वह चहक उठी, “आओ, आओ. मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी.”
“हाँ पिंकी.
मुझे भी तुमसे मिलने की जल्दी थी.” मीनू ने पिंकी से कहा.
“आखिर बात क्या
है मीनू, जो तुम मुझसे मिलने को बेताब थी.” पिंकी ने कहा.
“पिंकी, बात ही कुछ ऐसी है. तुम तो जानती हो कि तुम्हारे सिवा मेरा
कोई नहीं है जिससे मैं अपने दिल की बात कह सकूँ. तुम्हें याद है न मीनाक्षी की
शादी. वहाँ जिस लड़के को मैंने पहली नजर में देखते ही पसंद कर लिया था, आज वह मेरे घर अपने पापा के साथ आया था.”
“आखिर किसलिए?”
पिंकी पूछती है.
“उसे मेरी बहन
रेणु दीदी पसंद आ गयी है. वह अपने पापा के साथ मेरे घर उसका हाथ मांगने आए थे. वह
रेणु दी से शादी करना चाहता है. जबकि वह मेरी पसंद है. मुझे समझ में नहीं आता की
मुझे क्या करना चाहिए? इसलिए मैं तुमसे मिलने को आतुर थी कि कब मैं तुमसे मिलूँ
ताकि तुमसे अपनी समस्या के बारे में बात कर सकूँ.”
पिंकी कुछ देर
तक यह सुनकर सोंचने को विवश हो जाती है कि वह मीनू से क्या कहे? वह कहती है, “अगर तुम
मुझसे मेरा विचार जानना चाहती हो या मेरे से सलाह लेना चाहती हो तो सुनो, वह लड़का जिसे तुमने देखते ही पसंद कर लिया था. उसके बारे
में तुम कुछ नहीं जानती हो. दूसरी बात उस लड़के की पसंद तुम्हारी बहन है. निश्चय ही
उसने रेणु दी के बारे में विस्तृत जानकारी ली होगी. और सबसे बड़ी बात कि रेणु दी
तुम्हारी बड़ी बहन है, इसलिए रीती-रिवाज के मुताबिक उनकी शादी तुमसे पहले ही होनी
है. अगर इस विषय में किसी तरह हिम्मत कर तुम अंकल-आंटी से बात भी करती हो तो
लोक-लाज के भय से वे तुम्हारी बात को तवज्जो नहीं देंगे. इसलिए बेहतर यही होगा कि
तुम इस बात को यहीं विराम दो. अगर तुमने जरा सी भी तूल दी या घर-परिवार से बगावत
करने की कोशिश की तो तुम्हारे माता-पिता की समाज में किरकिरी हो जाएगी. हो सकता है
वे इसको सहन भी न कर सके और कोई अनहोनी हो जाये. इसलिए मेरी मानो, तुम समय का इंतजार करो और जो होता है उसे होनी मानकर होने
दो. इसी में तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की भलाई है.”
मीनू को समझ
नहीं आता कि वह क्या करे? वह पिंकी की माने या अपने दिल की बात को सुनकर माँ-बाप
से अपने मन की बात कह दे. अगर वह ऐसा करती है तो हो सकता है कि उसके पिता इसे उसकी
बगावत समझे. अगर वह अपने परिवार से बगावत करती है तो उसके पिता की समाज में बदनामी
हो जाएगी जो वह कभी नहीं चाहेगी. इसलिए वह ऐसा नहीं कर पाएगी. अतः उसके लिए यही
आखिरी रास्ता है कि वह पिंकी की बात मानकर जो होता है उसे होने दे.
पिंकी उसे
गुमसुम देखकर कहती है, “अगर तुम अपने परिवार से
बगावत कर भी लेती हो तब भी वह लड़का शायद तुम्हें न अपनाए. क्योंकि यह तुम्हारा
एकतरफा प्यार है. उसका प्यार तुम नहीं बल्कि तुम्हारी बहन है. तुम्हारे ऐसा करने
से हो सकता है कि उसके ऊपर नकारात्मक प्रभाव पड़े. और इस तरह यह भी हो सकता है कि न
तो वह तुम्हें अपनाए और न ही तुम्हारी बहन के बारे में सोंचे. हो सकता है वह इसे
तुमलोगों के पारिवारिक संस्कार से ही जोड़कर देख ले. दूसरी तरफ वह लड़का काबिल है, अच्छा पैसा कमाता है. इसलिए वह तुमलोगों के लिए अच्छा
रिश्ता हो सकता है. वह रिश्ता लेकर खुद तुम्हारे घर आया है न कि तुम्हारे पापा
उसके घर गए हैं.”
मीनू के घर में
उसके पापा रेणु की शादी के बारे में चर्चा करते है. रेणु की माँ तो यह सुनकर पहले
से ही खुश थी, परन्तु वर्मा जी से अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं कर रही थी. जब
वर्मा जी ने उनसे उनका विचार जानना चाहा तो उन्होंने छूटते ही अपनी स्वीकृति दे
दी.
उन्होंने कहा, “इसमें पूछने की बात ही क्या है? लड़का अच्छा है, इंजीनियर है, अच्छा कमाता
भी होगा. मुझे तो उसके पिताजी भी बड़े सुलझे हुए और साफ दिलवाले आदमी लगे. अगर ऐसा
नहीं होता तो वह खुद ही चलकर अपने बेटे की बातों में आकर हमारे घर नहीं आते. पर
इतना सबकुछ होने के बाद भी हमें लड़का, उसके परिवार, समाज में उनकी पारिवारिक
प्रतिष्ठा, उनका स्टेटस आदि के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करनी चाहिए. हमें
अपनी बेटी की शादी करनी है. वह अच्छी घर में जाए, जिस लड़के के साथ उसकी शादी हो वह
सुसंस्कृत हो, केयर करने वाला इन्सान हो. ताकि अपनी बेटी खुश रह सके.”
धीरे-धीरे कुछ
दिन बीत गए. वर्मा जी को रेणु की शादी तो करनी ही थी. क्योंकि उसकी उम्र भी हो
चुकी थी. उसके बाद उन्हें मीनू के बारे में भी सोचना है. जितनी जल्दी रेणु की शादी
होगी उतनी जल्दी ही वह मीनू की शादी कर पाएंगे. इसलिए वे अपने विश्वस्त लोगों के
माध्यम से महेश जी, सुरेश जी, उनके परिवार,
उनकी पारिवारिक स्थिति, समाज में उनकी प्रतिष्ठा
आदि के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त कर ली. वे प्राप्त जानकारी से संतुष्ट थे.
इसलिए उन्होंने भी उनके द्वारा दिए गए शादी के प्रस्ताव को स्वीकार करना ही उचित
समझा. उन्होंने अपनी पत्नी से इस विषय में सलाह-मशविरा कर अगले दिन ही महेश जी को
अपनी स्वीकारोक्ति देने का निर्णय किया. अगले दिन ही सुबह जल्दी उठकर, नित्य
क्रिया से निवृत होकर और नाश्ता-पानी कर उन्होंने फ़ोन उठाया और महेश जी को फ़ोन
मिला दिया. फोन महेश जी ने ही उठाया. कुछ औपचारिकता के बाद उन्होंने अपनी सहमति दे
दी.
उधर महेश जी और
उनके परिवार के लोग वर्मा जी से सहमति प्राप्त करने के बाद खुश नजर आए. जब यह खबर
सुरेश को मिली तो वह भी काफी खुश हुआ. कुछ दिन बाद ही आपसी सहमति से दोनों परिवार
के लोग मिलकर शादी की तिथि को निर्धारित कर दिया. समय के साथ-साथ शादी पूर्व होने
वाले रस्मों को भी पूरा कर लिया गया.
जैसे ही शादी
की तिथि निर्धारित हुई रेणु और सुरेश दोनों ने अपने परिवार वालों के माध्यम से एक
दूसरे का नंबर लिया और आपस में बात करने लगे. वे चाहते थे कि शादी पूर्व ही दोनों
एक दूसरे से अवगत हो लें. उन्होंने ऐसा ही किया. शादी का दिन भी आ गया. बारात भी
दरवाजे पर आ गई. शादी हुई और रेणु विदा होकर अपने ससुराल पहुँच गयी. रेणु की
सुन्दरता, उसकी व्यवहार कुशलता से उसके ससुराल वाले काफी खुश थे. समय बीतता रहा और
उसके अच्छे व्यवहार के कारण परिवार और रिश्तेदारों के बीच उसकी लोकप्रियता बढती
गई.
रेणु की शादी
हो गयी, वह अपने ससुराल चली गयी. फिर भी मीनू के मन में
कहीं न कहीं एक टीस कायम ही रही. वह सुरेश को भूल नहीं पा रही थी. जिसने उसे नहीं
चाहा उसे तो वह मिल गया. मगर उसके चाहने के बाद भी वह उसे प्राप्त न कर सकी. इसी
बात का टीस उसके मन को हमेशा खाए जा रही थी. उसके मन में अपने उस बहन के प्रति
त्याग के बजाए इर्ष्या की भावना उत्पन्न होने लगी. वह बहन जिसने बचपन में उसे अपने
गोद में खिलाया, अपने हिस्से का हर चीज उससे शेयर किया. चाहे उसके खिलौने हो, कपड़े
हो या किसी से प्राप्त कोई गिफ्ट ही क्यों न हो रेणु ने हर चीज को मीनू के साथ
शेयर किया. लेकिन आज उसकी अपनी ही बहन उसके प्रति नफरत, द्वेष, इर्ष्या, घृणा और
बदले की आग में जलने लगी. वह अब भी सुरेश को हासिल करने की कोशिश में लगी रही.
समय बीतता रहा
और वह समय भी आ गया जब मीनू को सुरेश के पास यानि रेणु के ससुराल जाने का अवसर मिल
गया. हुआ यूँ कि रेणु प्रेग्नेंट हुई और उसका आखिरी महीना भी आ गया. उसने अपनी माँ
मालती जी से मीनू को उसके पास भेजने का आग्रह किया. जिसे उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी
स्वीकार कर लिया. निश्चित दिन आने पर रेणु को पास के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में
उसकी डेलिवरी के लिए एडमिट कराया गया. संध्या होने से पूर्व ही रेणु ने एक सुन्दर
सी बेटी को जन्म दिया. परिवार के सभी लोग परिवार में एक नन्ही सी प्यारी और सुन्दर
सी बच्ची के आगमन पर खूब खुश थे. अगले दिन ही रेणु को अस्पताल से छुट्टी मिल गयी
और वह अपने घर आ गयी. जब उस प्यारी सी, नन्ही सी गुडिया की किलकारी आँगन में
गूँजती तो उसके दादा-दादी और साथ में माँ-बाप के ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहता.
खासकर उसकी दादी का समय तो हमेशा उसका केयर करने में ही बीत रहा था.
जैसे ही यह बात
रेणु को पता लगी उसका मन शंकित होने लगा. इधर मीनू और सुरेश के कार्यकलापों में
किसी भी प्रकार से कोई अंतर नहीं आ रहा था. दोनों के नजदीकियाँ और बढती ही जा रही
थी. अब तो सुरेश मीनू को साथ लेकर बाहर भी जाने लगा था और काफी समय बिताने के बाद
घर वापस लौटता था. यह सब जान-सुनकर रेणु को बहुत बुरा लगता था. एक दिन वक्त
निकालकर रेणु ने माँ से उसे वापस बुलाने का दबाब बनाया. माँ ने भी सोंचा कि अब
मीनू को वापस आ जाना चाहिए. क्योंकि बहुत वक्त गुजर चूका था. माँ ने उसके पापा से
बात कर उन्हें मीनू को वापस लिवा लाने के लिए रेणु के ससुराल भेज दिया. मजबूरन
मीनू को वापस आना पड़ा. क्योंकि पापा के कारण वह किसी प्रकार से कोई बहाना नहीं बना
सकती थी.
मीनू लौटकर तो
वापस आ गई मगर उसका मन अब अपने घर में ही नहीं लगता था. वह खोई-खोई सी रहने लगी
थी. उधर सुरेश का थोडा-बहुत यही हाल था. ऑफिस जॉब के कारण दिन का समय तो उसका कट
जाता था परन्तु रात को वह मीनू के ख्यालों में ही खोया रहने लगा था. उसे काफी देर
तक नींद नहीं आती थी. रात करवटें बदलने में ही बीत जाया करता था. इसका असर उसके
जॉब पर भी पड़ने लगा था. वह समय पर ऑफिस नहीं पहुँच पाता था और कभी-कभी तो वह
अबसेन्ट भी हो जाया करता था. जिससे उसका परफॉरमेंस ख़राब होने लगा. जब इस बात का
पता उसके कम्पनी के मालिक को लगा तो उसने भी सुरेश को एक बार चेतावनी तक दे डाली. इसके आलावा सुरेश कभी-कभी रेणु को घर पर ही छोड़कर मीनू के
पास अपने ससुराल भी जाने लगा. शुरू शुरू में जब मीनू की माँ को इसके पीछे का कारण
मालूम नहीं था वह सुरेश का खूब सत्कार किया करती थी. परन्तु जैसे ही उन्हें सारी
कहानी पता चली तो बहुत बुरा लगा.
एक दिन मीनू की
माँ ने मालती देवी ने अपने पतिदेव वर्मा जी को इस घटना की पूरो जानकारी दी तब
उन्हें भी बहुत बुरा लगा. वे सोंचने लगे कि क्या एक बहन अपनी ही सगी बहन के
जिन्दगी में जहर घोल सकती है. उन्हें लगा की नहीं, मीनू ऐसा नहीं
कर सकती. वह रेणु की जिन्दगी बर्बाद नहीं कर सकती. अगर वह सच में ऐसा कर रही है तो
मैं उसे अवश्य ही रोकूँगा. वह अपनी ख़ुशी के खातिर रेणु की ख़ुशी नहीं छीन सकती है.
दूसरी तरफ सुरेश के माता-पिता उसके व्यव्हार में आए बदलाव के कारण काफी चिंतित थे. वे यह जानना चाहते थे कि
आखिर सुरेश रेणु और अपने बच्चे से दूर क्यों रहने लगा है?
आखिर में एक
दिन सुरेश के माता-पिता ने रेणु को अपने पास बुलाया. वे दोनों उसके व्यवहार से
काफी खुश थे इसलिए वे भी उसे किसी प्रकार से दुखी देखना नहीं चाहते थे. उन्होंने
रेणु से कहा, “बेटी, मैं तुमसे एक बात पूछना चाहता हूँ और
उम्मीद करता हूँ कि तुम उसका सही-सही जबाब दोगी. आजकल मैं यह देख रहा हूँ कि सुरेश
तुमसे और गुड़िया से दूर-दूर रहने लगा है. इसके पीछे का कारण आखिर क्या है?”
“नहीं, पापा जी ऐसी कोई बात नहीं है. ऑफिस के काम की अधिकता के
कारण वे मेरे खातिर समय नहीं मिल पा रहा होगा.” रेणु ने बड़ी विनम्रता से बात को
घुमाने की कोशिश की. परन्तु महेश बाबू सुरेश को बड़े अच्छे से जानते थे. वह इस बात
को मानने को तैयार नहीं थे कि उनका बेटा लापरवाह भी सकता है. इसलिए उन्होंने जोर
देकर पुनः रेणु से पूछा. अब रेणु के अंतर्मन की जमी बर्फ पिघल उठी.
उसने कहा, “पापाजी गलती मेरी ही है. न मैं मीनू को अपने पास बुलाती
और न ही आज मुझे यह दिन देखने पड़ते. जब मीनू गुडिया के जन्म पर मेरे पास आई थी तभी
से इनका लगाव मेरे से कम होता गया था. परन्तु मैं इसका कारण नहीं जानती कि आखिर
ऐसा क्यों हुआ.”
“कुछ नहीं बेटी, तुम चिंता मत करो. उसे मैं ऐसा नहीं करने दूँगा. अगर वह
मेरा बेटा है तो तुम मेरी बहु हो. तुम्हें उसने खुद ही पसंद किया था. किसी ने उसपर
कोई दबाब नहीं डाला था. बल्कि तुमसे और तुम्हारे परिवार वालों से तो हम परिचित भी
नहीं थे. फिर वह तुम्हारे साथ ऐसा कैसे कर सकता है?” महेश बाबु ने रेणु से कहा.
एक रविवार के
दिन सुरेश घर पर था. उसके पिता महेश बाबू बैठक में अपनी पत्नी के साथ बैठे थे. तभी
वहा सुरेश आ गया. उन्होंने सुरेश से कहा, “बेटा, कुछ
देर मेरे पास बैठो. मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है.”
“क्या हुआ
पिताजी?” सुरेश ने अपने पापा महेश जी से पूछा.
“आजकल मैं देख
रहा हूँ कि तुम्हारा रेणु और अपने बच्ची के प्रति लगाव कम हो रहा है. तुम कभी देर
से लौटते हो और कभी तो सुबह सवेरे ही चले जाते हो. जब देर से घर आते हो तो बिना
किसी से कुछ बात किए खाना खाकर चुपचाप सो जाते हो. न कभी उस नन्ही सी गुड़िया को
अपने गोद में लेकर खेलाते हो और न ही रेणु से कुछ बात ही करते हो. आखिर तुममे यह
परिवर्तन कैसे आया? तुम तो कभी इतने लापरवाह नहीं थे. फिर अब क्या हुआ?” महेश जी
ने सीधे और सपाट शब्दों में सुरेश से प्रश्न किया.
“ऐसी कोई बात
नहीं है पिताजी.” सुरेश ने पिता से कहा.
“तुम्हारा किसी
और के साथ कोई चक्कर तो नहीं है? अगर ऐसा है भी
तो एक बात याद रखना तुम्हें हमसे और इस परिवार से अपने रिश्ते तोड़ने होंगे. तभी
तुम किसी को अपने पास रख पाओगे. और जहाँ तक रेणु की बात है तो वह एक पढ़ी-लिखी,
सुसंस्कृत, सभ्य और प्यार करने वाली लड़की है. उसने इस घर को अपना घर और तुम्हारे
माँ-बाप को अपना माँ-बाप माना है और सबसे बड़ी बात तो यह है कि अब हमारे आंगन में
एक प्यारी सी गुडिया भी आ गयी है. जिसकी किलकारी से यह घर गूंजता रहता है. इसलिए
मैं तुम्हारे ऐसे किसी भी कृत्य को स्वीकार नहीं कर सकता. और दूसरी बात कि रेणु
तुम्हारी खुद की पसंद है. उसके माता-पिता हमारे पास नहीं आए थे बल्कि हम गए थे
रिश्ता लेकर.” उसके पिता ने बड़े तल्ख़ लहजे में सुरेश से कहा.
“ऐसा आपसे
किसने कहा? ऐसी कोई भी बात नहीं है.” सुरेश ने कहा.
“मैं भी ऐसा ही
सोंचता हूँ कि ऐसा कैसे हो सकता है?” महेश बाबू ने
व्यंगपूर्ण लहजे में कहा.
सुरेश के जाते
ही महेश बाबू ने वर्माजी को फ़ोन लगाया. उधर से आवाज आई, “हेलो.” इधर से महेश बाबू
ने कहा, “हेलो! मैं सुरेश का पिता बोल रहा हूँ.”
“हाँ..हाँ..समधी
जी, बताइए कैसे याद किया.” वर्मा जी ने फ़ोन पर ही कहा.
“वर्मा जी,
रेणु अब केवल आपकी ही बेटी नहीं मेरी भी बेटी है. वह मेरे घर की बहु है. हम उसकी
आँखों में आँसू नहीं देख सकते हैं. इसलिए मुझे यह पूरा विश्वास है की उसकी ख़ुशी के
लिए आप वह सब करेंगे जो एक बाप को अपनी बेटी के लिए करनी चाहिए. आपकी दूसरी बेटी
है मीनू जो अपनी ही बहन के जिन्दगी में जहर घोलने का प्रयास कर रही है. आप उसे
संभाल ले और मेरा माने तो जल्द ही उसकी शादी कहीं और कर दें. अगर आपको किसी प्रकार
की कोई परेशानी हो तो हम आपकी मदद करने के लिए हमेशा तैयार मिलेंगे.” महेश बाबू ने
वर्मा जी से बात की.
“आप चिंता न
करें समधी जी. रेणु मेरी बेटी है और हम उसके हित का सौ प्रतिशत ख्याल रखते हैं.
मैं जल्द ही मीनू की शादी कहीं न कहीं करने का उपाय करता हूँ.” वर्मा जी ने कहा.
वर्मा जी ने
शीघ्र ही एक अच्छा लड़का देखकर मीनू का रिश्ता फाइनल कर दिया. उनलोगों से मीनू को मिलने
की तिथि भी निश्चित कर ली गयी. घर आकर वर्मा जी मालती और मीनू दोनों को इस बात की
सूचना दी. मीनू तो इस बात को सुनकर हक्का-बक्का रह गई. परन्तु वह अपने पिता के बात
का न तो जबाब दे सकी और न ही कोई विरोध कर पाई. परन्तु उसके मन में उथल – पुथल तो
मच ही गई. वह अपने कमरे में गयी, अपना फ़ोन उठाई और छत पर गयी. वहां उसने सुरेश को
फ़ोन मिलाया. कुछ देर तक दोनों में इधर-उधर की बाते होती रही. अंत में सुरेश ने
उससे कहा, “देखो मीनू, तुम्हारी बहन
मेरी पत्नी है. मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ. उसके आलावा मेरी एक प्यारी सी, नन्ही
सी गुड़िया भी है. जो अभी-अभी इस दुनिया में आई है. तुम मेरी साली हो, मेरी पत्नी
की छोटी बहन. इस नाते मुझे तुमसे प्यार है. परन्तु ऐसा प्यार नहीं कि मैं तुम्हारे
लिए अपनी पत्नी, अपनी बच्ची, अपने माँ-बाप
और घर परिवार छोड़ दूँ. मुझे मेरे माँ-बाप ने ऐसा संस्कार नहीं दिया है. इसलिए मेरी
मानो तो जहाँ तुम्हारे पापा ने तुम्हारी शादी फाइनल कर दी है, तुम ख़ुशी-ख़ुशी वहाँ शादी कर लो. अपने मन से इस भ्रम को
निकाल दो कि मैं तुमसे शादी करने वाला हूँ.”
मीनू बहुत उदास
हो गयी. उसे इस बात कि उम्मीद नहीं थी कि सुरेश उसे इस तरह से जबाब देगा. अब उसके
पास अपने पापा की बात को मानने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था. उसे अपने
कॉलेज की दोस्त पिंकी की बातें एक-एक कर याद आने लगी. मीनू को लड़केवाले आकर और
देखकर चले गए. शादी का दिन फाइनल हो गया. नियत तिथि पर बारात आई और दुल्हन को लेकर
चली भी गयी. मगर शादी में रेणु और सुरेश दोनों में से कोई भी नहीं गए.
जब यह सारी
कहानी ख़तम हो गयी तब एक दिन रेणु की दोस्त मीनाक्षी अपने पति मुकेश के साथ उससे
मिलने आई. उसने रेणु से कहा कि “मुझे तुम्हारी कहानी जैसे ही पता लगी, मैं भागी-भागी तुम्हारे पास आई. मैं यह सोंचने पर विवश थी
कि मीनू जो कि तुम्हारी सगी बहन है, तुम्हारे साथ ऐसा कैसे कर सकती है. मगर ऐसा
हुआ, यह जानकर मुझे बड़ा दुःख हुआ. परन्तु जो होना
होता है वह होकर रहता है और जो नहीं होना है उसे कोई जबरदस्ती करा भी नहीं सकता
है. जैसे सुबह का भूला शाम को घर लौटकर आ जाता है तो उसे भूला नहीं कहते. ठीक उसी
प्रकार तुम्हारी परिक्रमा पूर्ण हुई. तुम्हारे जीवन में पहले सास-ससुर और पति का
प्यार मिला, उसके बाद तुम्हें पति का विछोह झेलना पड़ा जिसका
कारण तुम्हारी खुद की सगी बहन बनी. अब फिर से तुम्हे वह प्यार दुबारा से हासिल
हुआ. इस तरह मानकर चलो कि आज तुम्हारी परिक्रमा पूर्ण हो गयी. तुम्हारी बहन भी
ख़ुशी-ख़ुशी अपने ससुराल चली गयी.”
डिस्क्लेमर: इस कहानी के सभी पात्र, घटना और दृश्य सभी काल्पनिक हैं. इसका किसी भी व्यक्ति या परिवार से कुछ लेना देना नहीं है. अगर कोई समानता होती भी है तो वह केवल संयोग ही हो सकता है.
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