सिन्दूर की कीमत

                             

सिन्दूर की कीमत

                      

अहसास तो इस बात का,

मुझे कभी हुआ ही न था।

एक दूसरे के साथ में हम,

जीवनभर नहीं रह पाएँगे।

 

वह कौन सी परिस्थिति थी,

जिसने तुम्हें मजबूर किया।

एक साथ हम नहीं रह सके,

और एक दूसरे से जुदा हुए।

 

सात फेरों के वक्त जो हमने,

साथ रहने की कसमें ली थी।

साथ में क्यों न रह पाए हम,

और जुदा, तुमसे हम हो ए।

 

कहते हैं शादी एक बंधन है,

जो होता है सात जन्मों का।

जोड़ियाँ बनाता है ऊपरवाला,

निभाते उसे हम, खुद ही हैं।

 

किस तरह एक छोटा तिल,

देखते ही देखते ताड़ बना।

राई सी थी अपनी समस्या,

जाने वह कैसे पहाड़ बना।

 

क्यों सामंजस्य न हो पाया,

क्यों खुद ही तकरार बढ़ा।

अपनों के बिछाए जाल में

उलझे, कभी न प्यार बढ़ा।

 

एक छोटी वह समस्या थी,

जिसको नहीं सुलझा पाए।

जीना जैसे मुश्किल हो रहा,

और घेरते थे, गम के साए।

 

अपनी भूल अज्ञान के वश,

बात अदालत में पहुँच गई।

आपस में जो न हुआ कभी,

सुनने को मिलती बात नई।

 

जज ने जब निर्णय सुनाया,

मेरा खर्च तुम्हें भरना होगा।

बेशक फाँके में तुम ही रहो,

निर्णय तो पूरा करना होगा।

 

उस दिन कचहरी को पहुँचा,

गुमसुम मैंने, तुम्हें तब देखा।

अफसोस मुझे जो होने लगा,

नहीं खींचनी है, गहरी रेखा।

 

कुछ ही दिन बीते बिछड़े हुए,

मुझको नया एक नाम मिला।

लोगों की कानाफूसी सुनकर,

मेरे दिल को ये पैगाम मिला।

 

मैं अब तक तुम्हारी हूँ केवल,

फिर भी परित्यक्ता कहलाई।

अंतर्मन में जो बसे हो तुम तो,

क्यों खाए जाती, हमें तन्हाई।

 

अहसास मुझे अब हो रहा है,

वह सारा कसूर, बस मेरा है।

फिर क्यों तुम सारा दर्द सहो,

न उजड़े अपना ही बसेरा है।

 

मेरा सुहाग सिर्फ तुम ही हो,

तुमसे ही है दुनिया यह मेरी।

जब तक साथ तुम्हारा मिले,

तब तक मेरी कद्र सदा होगी।

 

जब तक साथ तुम्हारा होगा,

तब तक ये  शान रहेगा मेरा।

जब तुम ही नहीं फिर मैं कैसे,

कैसे तब गुमान, रहेगा मेरा?

 

जीवनसाथी और दीया - बाती,

हम साथी रहेंगे, ज्योति जला।

तुमसे जुदा होकर ही मुझे, इस

सिन्दूर की कीमत, पता चला।

 

 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.