माँ – त्याग और ममता की देवी

माँ त्याग और ममता की देवी होती है. उसकी तुलना न तो मंदिर के देवी से की जा सकती है और न ही अन्य नारियों से. मंदिर के उस देवी को भी माँ की संज्ञा दी जाती है. परन्तु वह उस देवी से भी अधिक महान होती है. वह केवल एक स्त्री ही नहीं होती बल्कि माँ के रूप में वह अपने अन्दर सारा संसार समाये हुए रहती है. वह पहली गुरु भी होती है जो अपने बच्चों को हँसना,बोलना,चलना,सिखालाती है. वह एक सच्चा पथ-प्रदर्शक भी होती है जो भले-बुरे का ज्ञान कराती है. वह यह बताती है कि उसके लिए कौन सी राह आसान और सुगम है जिसपर चलकर उसका औलाद अपने जीवन के सफ़र को आसानी से पार कर सकता है. इसके अलावा वह एक सच्चा दोस्त भी होती है जो अपने बच्चों की हर गलतियों को नजरंदाज करने का प्रयास करती है. उनका बच्चा अपने बालपन में जब अपने किसी दोस्त से लड़ पड़ता है तो माँ बेटे की गलती होते हुए भी उसका बचाव करने का प्रयास करती है. वह कभी भी इस बात को मानने को तैयार नहीं होती है कि उसका बच्चा कभी गलत हो सकता है.इस सबके अलावा वह एक सच्चा हितैषी और भविष्यद्रष्टा भी होती है जो कभी-कभी बच्चे के सुखद भविष्य के लिए अपने पति से भी लड़ जाती है ताकि उसका भविष्य सुरक्षित हो सके. जिस घर में भाई की बहन नहीं होती वहां माँ एक बहन का भी रोल निभाती है, वह अपने बच्चे के साथ हँसती, बोलती, खेलती है ताकि बच्चे को एकाकीपन का एहसास कभी न होने पाए. इसलिए यह ककह जाता है कि माँ तो आखिर माँ ही होती है.


माँ – त्याग और ममता की देवी

हम कह सकते हैं कि माँ गुणों की खान होती है, जिसमें से कुछ का वर्णन हम अपने ज्ञान और अनुभव के अनुसार कुछ इस प्रकार कर सकते हैं:


माँ का प्यार:

 

माँ का प्यार अपने बच्चों के प्रति निस्वार्थ होता है. वह बिना किसी लालच या अभिलाषा के अपने बच्चों को प्यार करती है. जन्म से लेकर अपने पैरों पर खड़ा होने तक वह अपने बच्चों के हर सुख सुविधाओं का ख्याल रखती है. कब उसका बच्चा नींद से जागेगा, जब जागेगा तो क्या नाश्ता करेगा, नाश्ते में उसे क्या पसंद है, फिर वह खाना क्या खायेगा, अगर खायेगा भी तो कब खायेगा आदि. इस तरह के हजारों सवाल उस माँ के जेहन में होता है. वह माँ अपने बच्चे की हर क्रिया और प्रतिक्रिया का ख्याल रखती है. जबतक उस माँ का बच्चा खा नहीं लेता है, वह माँ अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं करती है. जैसे ही उसका बच्चा भरपेट भोजन कर लेता है उसका कलेजा तृप्त हो जाता है. केवल भोजन ग्रहण करने तक ही माँ का प्यार सीमित नहीं रहता है. वह बच्चा समय पर स्कूल कैसे जाएगा, अगर वह स्कूल गया है तो समय पर घर आया कि नहीं. अगर समय पर वापस घर नहीं आ सका तो उसके दिमाग में हजारों तरह की शंकाएँ जन्म ले लेती हैं. फिर वह उसी उधेड़ बुन में अपना समय बच्चे के स्कूल से वापस आने तक लगा देती है. जब वह सही सलामत घर वापस आ जाता है वह चैन की सांस लेती है. माँ के प्यार का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता. वह तो अपरिमित और असीमित होता है जिसे न तो किसी तराजू में ही तौला जा सकता है और न ही किसी सीमाओं में बांधा जा सकता है. जब माँ की ममता उमड़ पड़ती है तो वह उन्मुक्त होकर सभी सीमाओं को लाँघ जाती है. बुजुर्गों ने सच ही कहा है कि एक माँ के लिए उसका औलाद सबकुछ होता है, शायद उसके पति से भी ज्यादा. वह बच्चों की कारगुजारिओं पर उसकी नादानी समझ कर पर्दा डालने का प्रयास करती है ताकि उसका बच्चा दुनिया की नजरों में सर उठाकर जी सके.


एक माँ जिसका बेटा, जो उसके कलेजे का टुकड़ा है अपनी माँ और घर परिवार को सुख सुविधा देने के लिए अपनी माँ और अपने घर को छोड़कर परदेश जाता है और किसी कारणवश वह त्यौहार के अवसर पर भी घर नहीं आ पाता है तब उस माँ की अवस्था को समझना आसान नहीं होता है. जब बेटा परदेश से लौटकर वापस घर जाता है तो माँ सबसे पहले उसका हाल-चाल पूछती है. वह यह जानना चाहती है कि वह वहां पर कैसे रहता है? समय पर खाना खाता है या नहीं, स्वास्थ्य उसका ठीक रहता है कि नहीं (बेशक बेटा खा-पीकर मोटा ही क्यों न हो गया हो, माँ तब भी पूछती है). परन्तु वह यह कभी नहीं पूछती है कि वह कहाँ काम करता है, क्या कमाता है और जो कमाता है उसका क्या करता है? यही माँ का प्यार है जो वह अपने बच्चों पर उड़ेलती है. एक मशहूर रचनाकार ने लिखा है कि:

                                              मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार
                                         दुख नें दुख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार

 

माँ का त्याग:

 

माँ को त्याग की देवी कहा गया है. वह अपने बच्चों की ख़ुशी और उनकी सुख सुख सुविधाओं के लिए अपना सबकुछ त्याग देती है. बेशक उसे नमक रोटी ही खाकर रहना पड़े, पर अपने बच्चों को वह हमेशां गर्म और पौष्टिक भोजन कराती है. उसे चाहे पानी पीकर ही सारा दिन गुजारना पड़े मगर वह अपने बच्चे को भरपेट भोजन कराती है. माँ अपने गर्भ में नौ महीने तक रखकर बच्चे को जन्म देती है, उसे पाल पोसकर बड़ा करती है, पढ़ाती-लिखाती है और जब वह इस बात के लिए आश्वस्त हो जाती है कि मेरा बच्चा अपने पैरों पर वह ठीक ढंग से खड़ा होने में समर्थ हो गया है तो उसे परपुत्री के हाथों में सौंप देती है और खुद को उनसे अपने आपको अलग थलग कर लेती है. इसके बाद से वह उनके किसी कार्यों में दखल नहीं देती है. यह माँ का त्याग है. इस सम्बन्ध में किसी महान कवि ने बड़ा ही सुन्दर लिखा है:

 

                                 “माँ ही वह शक्ति है जो आत्मा की निचोड़ संतति को देती है.
                                      कर निज सुख का त्याग, नाव बिना पाल के खेती है.
                                    जब तक बच्चा छोटा है, उसे हर सुख सुविधाएँ देती है.
                                           पैरों पर होते खड़ा उसे परपुत्री को दे देती है.”
 

यही माँ का त्याग है. हमने अपने बचपन में उस माँ को भी देखा है जिसके पास पहनने के लिए केवल दो ही साड़ी थी. आज एक को पहनती थी तो कल दूसरे को. परन्तु उनके अन्दर जज्बात की कमी न थी. इतना सबकुछ सहने के बाद भी उनके चेहरे पर तनिक शिकन न थी. उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर एक अच्छा इंसान बनाया जो आज अपने पैरों पर खड़े है. माँ तो गुजर गई पर आज उनका बच्चा अपनी खुशहाल जिन्दगी जीने में समर्थ है तो माँ की बदौलत.


माँ की तपस्या:

  

अपने औलाद की उत्तम परवरिश करना हर माँ-बाप का एक सपना होता है. इसके लिए वह अपना सब कुछ न्योछावर कर देती है. बच्चों का सुख-दुःख, ख़ुशी-गम, अच्छा-बुरा आदि हर चीजों की निगरानी वह अपनी पारखी नजर से करती है. और जैसे ही उन्हें इस बात का भरोसा हो जाता है कि उनका बच्चा अब अपनी आनेवाली जिन्दगी को सुख और शांति से जी सकता है तब उनके मन को एक गहरा सकून मिलता है. तब उन्हें लगता है कि उनकी तपस्या पूर्ण हुई.


माँ का रूप:

 

इस संसार में माँ के कई रूप देखने को मिलते है.  एक माँ वह होती है जो किसी मजबूरी में आकर बच्चे को जन्म देती है, पर बच्चे को जन्म तो देती है परन्तु जन्म देते ही उसको ठुकरा देने पर विवश भी होती है, जैसे कुंती. उसने दुर्वासा ऋषि के द्वारा दिए गए वरदान का दुरूपयोग कर अपने कुँवारेपन में सूर्य देवता का आवाहन कर कर्ण को जन्म दिया. परन्तु लोक-लाजवश उन्हें उनका परित्याग भी करना पड़ा. दूसरी माँ वह होती है जो जन्म तो देती है पर उसका पालन नहीं करती या कह सकते है कि उसका पालन नहीं कर पाती है, जैसे स्वयं भगवान कृष्ण. जन्म तो उन्हें कारागार में देवकी माँ ने दिया परन्तु उनका पालन यशोदा माँ ने किया. इन सबसे ऊँचा कद उस माँ का होता है जो जन्म भी देती है, पालन भी करती है और अपने बच्चों के खातिर बड़ी से बड़ी बाधाओं एवं विपदाओं का भी सामना करने से नहीं घबराती है. वह माँ सच में महान होती है. उसकी तुलना इस जगत के किसी भी प्राणी से नहीं की जा सकती है. उस माँ के सामने किसी की भी कोई बिसात नहीं होती है.

 

माँ की छाया:

 

जब कभी बच्चा घर के बाहर से थका-हारा घर के अन्दर प्रवेश करता तब माँ उसे अपनी ममता के छाँव तले उसे ठंढक देने का प्रयास करती है. जब वह अस्वस्थ होता है माँ दिन-रात उसके सिरहाने तले बैठकर उसके स्वस्थ होने तक के समय का बेचैनी से इन्तजार करती है. ईश्वर से सदा ही यह कामना करती है कि उसका बच्चा जल्दी से जल्दी स्वस्थ होकर अपने घर को लौट सके. इतना ही नहीं कुछ माँ तो कई तरह के देवताओं की मन्नत भी मान देती है. और जैसे ही वह स्वस्थ होता है तो उस माँ के चेहरे पर जो प्रसन्नता के भाव नजर आते हैं उसे किसी शब्द के तराजू में नहीं तौला जा सकता है.


माँ का एहसास:

 

माँ को इस बात का एहसास अपने संतान के बचपन से ही हो जाता है कि उसका औलाद किस लायक है और अपने जीवन के सफ़र में कहाँ तक जा सकता है. कहते हैं न कि “पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं”. इस बात की पहचान माँ ही कर सकती है. अपने संतान के ऊपर आनेवाली आपदाओं का अंदाजा पहले से ही लगाकर वह उसे सचेत कर देती है ताकि उसका सपूत हर बाधा का सामना आसानी से कर सके. यहाँ तक कि राह में चलते हुए जब कभी बिल्ली रास्ता काट जाती है तो माँ का मन यह सोंचकर परेशान हो जाता है कि बिल्ली ने रास्ता काट दिया है, कहीं कुछ अमंगल न हो जाए. इसलिए माँ हरपल अपने संतान के प्रति सचेत रहती है.

 

माँ का विश्वास:

 

हर माँ को अपने संतान के ऊपर इतना विश्वास होता है जिससे कभी भी वह इस बात को मानने को तैयार नहीं होती है कि उसका बच्चा किसी के साथ कभी भी कुछ गलत कर सकता है. लाख बुराई होते हुए भी माँ उसे बुरा मानने को तैयार नहीं होती है जबतक कि उसके औलाद के अवगुणों को प्रमाणिक रूप से साबित न किया जा सके. पर जैसे ही उसके बुराई को या अवगुणों को प्रमाणिक रूप से सत्यापित कर दिया जाता है उस माँ का दिल जार-जार रोता है. यह माँ का विश्वास है.

 

माँ का दर्द:

 

माँ को दर्द तब होता है जब उसका औलाद उसे दर-दर की ठोकरें खाने को छोड़ देता है. जब उस माँ को वही औलाद जिसको पालने में, सवाँरने में वह अपने जीवन की सारी पूँजी झोंक देती और अपने संतान को अपने पैरों पर एक खम्बे की तरह स्थापित कर देती है, वही संतान जब अपने माँ की क़द्र नहीं करता है, उसके साथ प्यार के दो मीठे बोल नहीं बोलता है, उसकी जरूरतों का ख्याल नहीं करता है तब उस माँ का दिल जार-जार रोता है. हद तो तब हो जाती है जब वह औलाद जो अपनी माँ के जिगर का टुकड़ा है, अपनी ही माँ को वृद्धाश्रम में छोड़कर घर वापस लौट जाता है. तब उस माँ को दर्द होता है कि व्यर्थ ही हमने अपने जीवन के सुनहरे पल को इन औलादों के चक्कर में गवां दिया. वही औलाद जिसको अपने जिगर का टुकड़ा समझा था, अपने खून की बूँदे पिलाकर उसे इस धरती पर आने का अवसर दिया था आज एक पल कुछ सोंचे बिना ही अपनी माँ को अपने से दूर कर दिया. इतना कष्ट, दुःख झेलने के बाद भी अपने संतान के विषय में वह कभी भला-बुरा न ही कहती है और न ही सोंचती है. वह केवल इतना ही सोंचती है कि हमने अपना फर्ज पूरा किया. आज अगर वह मेरे साथ किए जानेवाले दुर्व्यवहार, अन्याय, प्रताड़ना को ही अपना फर्ज समझता है और इसी में अपनी ख़ुशी महसूस करता है तो उसे खुश रहने का हक़ है, वह खुश रहे.

 

पर उपरवाला सबकुछ देखता है, उसकी लाठी बेजुबान होती है, वह किसी के साथ बुरा नहीं करता है. परन्तु सजा सबको देता है. अगर वह भी सजा न दे तो लोग निरंकुश हो जाएँगे, अपनी मर्यादा की सारी सीमाएँ लाँघ देंगे. इसलिए सजा तो होती है चाहे तत्काल हो या फिर बाद में. पर दंड अवश्य मिलता है. आज अगर कोई अपनी माँ-बाप के साथ बुरा वर्ताव करेगा तो कल को उसकी भी औलादें होंगी जो उसके साथ वैसा ही व्यव्हार करेंगी जैसा उसने अपने माँ के साथ किया है.

 

पर एक बात हर किसी को सोंचनी चाहिए कि माँ का जीवन में कितना महत्व होता है. वह माँ ही है जिसके सहारे जीवन की सारी खुशियाँ, सारी मौज-मस्ती मनुष्य कर पाता है. जब किसी की माँ उसके बचपन में ही उसे छोड़कर परलोक सिधार जाती है जब वह एक दूध पीता नन्हा बालक था. जरा उस बच्चे के बारे में सोंचकर देखो कि उसने अपने जीवन में किन-किन विपदाओं का सामना किया होगा. हो सकता है कि उसे दोनों शाम का भरपेट भोजन भी नसीब न हुआ हो. या फिर उसके पिता उसकी ही खातिर उसके लिए एक सौतेली माँ ले आया हो जिसने उसपर जानवरों से भी ज्यादा जुल्म किया हो. वह बच्चा कैसे बड़ा हुआ होगा? हो सकता है कि बड़ा होने से पहले ही वह भी परलोक को सिधार गया हो:

 

द्रवित दृश्य उस पल का था,
जब चिरनिद्रा में, माँ सोई थी ।
लिपट के माँ के हृदयस्थल से,
उस बालक की आँखें रोई थी ।  

 

वह अबोध एक बालक था,
          जिसको खुद का कुछ पता नहीं ।
          भटक न जाए अपनी राह से,
          किसी से कुछ बता सकता नहीं ।

 

माँ-बाप जीवन में दुबारा नहीं मिलते हैं इसलिए अवश्य ही उनके बारे में सोंचना चाहिए. सबकुछ प्राप्त किया किया जा सकता है पर माँ-बाप एक बार खो देने के बाद दुबारा नहीं मिलते. जिस तरह से एक छोटे बच्चे को माँ-बाप की जरूरत महसूस होती है उसी तरह से माँ-बाप को भी जब वे असमर्थ हो जाते हैं, संतान की जरूरत पड़ती है. पर उस वक्त जव वही संतान उनको ठुकरा देता है तब उनको अपनी आँखों के सामने अँधेरा नजर आता है. संतान अगर दो-चार हो तब तो शायद स्थिति संभल भी जाती है परन्तु जब एक ही होता है तब उनके लिए बड़ी मुशिकल घड़ी आ जाती है. उनको यह एहसास होता है कि हमने अपने इस औलाद के लिए क्यों इतना कुछ किया, क्यों न हम अपने इस औलाद को पहचान सके?

 

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