अपना ही घर तोड़ लिया है,
अपने घर के वाशिंदों ने।
छोड़ चुके हैं उन शाखों को,
रहनेवाले कई परिंदों ने।
यह सवाल उठता है अब कि,
शाखों को छोड़के जाए कहाँ ?
चैन-सुकून सब छीन चुका है,
मन की पीड़ा, बतलाए कहाँ?
जिनसे गम बाँट सके अपना,
उनका ही न कोई ठिकाना है।
बिछड़ गए वह, जो अपने थे,
बैरी बन गया सारा जमाना है।
कल की बातें हैं, जब बागों में,
कलरव चिड़िया करती रहती।
सूनापन काट रहा है वहाँ अब,
शाखा भी कुछ न कहा करती।
पेड़ों की झुरमुट में छिपकर,
कोयल तब गीत सुनाती थी।
भंवरे की आहट पा कलियाँ,
तब मंद-मंद मुसकाती थी।
दरवाजे पर बँधी वह गाएँ,
भूख लगने पर रंभाती थीं।
माँ के डाँट को सुन चेरिन,
गैया को चारा खिलाती थी।
घर के मुंडेरों पर, जब गौरैया
चुन-चुन कर फुदका करती।
जब काँव-काँव कौआ करता,
माँ भी अहसास किया करती।
शायद आज अपने घर पर,
मेहमान, कोई आनेवाला है।
शाम ढले तक आए कोई न,
ढाढस से मन बँधनेवाला है।
हो सकता है कल आए कोई,
घर-आँगन को महका जाए।
आने पर जिसके खुशी मिले,
जब जाए, मन मुरझा जाए।
चलचित्र की भाँति सबकुछ,
मन:पटल पर चलता रहता है।
लौट न पल वह आए कभी,
यादों की गठरी खोले देता है।
फिर भी मनुज तन अग्यानी हो,
अपने घर में ही सेंध लगाता है।
क्षुद्र स्वार्थ के खातिर वह कैसे,
निज उपवन को झुलसाता है।


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