सर्दियों की एक सुबह थी। दिल्ली के किसी पार्क में एक बेंच पर अधेड़ उम्र का एक व्यक्ति कम्बल ओढ़े बैठा हुआ था। वह उस पार्क में रोज आता और उसी बेंच पर बैठा करता था। उसके चेहरे पर गंभीर उदासी छाई हुई थी और उसकी आँखें कुछ खोई सी लग रही थीं। कपड़े मैले और फटे हुए थे, चेहरे पर दाढ़ी बढ़ चुकी थी और चेहरा किसी अनकहे दर्द से भरा हुआ था। वह था — सौरभ।
पार्क में बच्चे इधर से
उधर दौड़ते हुए खेल रहे थे। तभी उसके पास से एक बच्चा अपनी माँ के साथ गुजरा और बोल
पड़ा — “मम्मी देखो, ये वही अंकल है जो रोज़ यहाँ आकर बैठते हैं, पता नहीं क्यों? और वह
हमेशा गुमसुम और उदास रहते हैं।”
जाते हुए उस बच्चे की बात
को सुन सौरभ ने मुस्कुरा दिया। उसकी मुस्कान के पीछे उसकी
लंबी कहानी और उसके साथ गुजरा हुआ दर्द छिपा हुआ था जिसे वह किसी से बयां नहीं कर
सकता था मगर आज हम उस कहानी की एक-एक परत खोलेंगे...
एक दिन सौरभ के मन में आया
कि उसे अपने बाबूजी से अपने भविष्य के बारे में बात करनी चाहिए और मौका देखकर उसने
अपने मन की बात अपने बाबूजी को बता दिया, “बाबूजी, मैं सोच
रहा हूँ कि मैं शहर चला जाऊँ और वहाँ जाकर अपने सपनों को पंख दूं ताकि मैं भी ऊँचा
उड़ सकूँ...”
लेकिन उसे तो
अपने सपने पूरे करने थे। वह जानता था कि किताबों में जो दुनिया देखी है, वो
हकीकत में देखने के लिए उसे अपने छोटे से गाँव से बाहर
निकलना होगा। आखिरकार, अपनी जिद, गाँववालों के सहयोग और अपने पिता की पेंशन के कुछ पैसे लेकर सौरभ शहर के लिए
रवाना हुआ।
वह ख़ुश था
कि अब उसे शहर में अच्छे मौके मिलेंगे। किताबों में ही उसने दुनिया देखी थी, और अपने सपनों को पूरा करने के लिए उसने यहाँ कदम रखा। मगर शहर पहुंचते ही उसे
लगा कि उसने एक नई दुनिया में कदम रख दिया है — ऊँची- ऊँची इमारतें, भीड़-भाड़, बसों, ऑटो और अन्य प्रकार
के वाहनों का शोर, साथ में उसकी अपनी हसरतें
और उसको पूरा करने का मन के अन्दर एक होड़। इस सबसे वह विस्मित और आश्चर्यचकित हुआ,
क्योंकि इससे पहले उसे किसी बड़े शहर में जाने के अवसर नहीं मिला था। शहर में
पहुँचकर अपने किसी परिचित की मदद से उसने किराए का एक कमरा लिया और एक सरकारी
कॉलेज में अपना एडमिशन कराया।
उसने जी-जान लगाकर पढ़ाई करनी
शुरू की। उसे यकीन था कि डिग्री मिलते ही नौकरी मिल जाएगी। लेकिन... जीवन की असल
परीक्षा तब शुरू हुई जब उसकी पढ़ाई पूरी हो गई। जैसे-जैसे
दिन बीतते गए, उसे एहसास हुआ कि पढ़ाई पूरी
करने के बाद भी शहर में उसे नौकरी नहीं मिल रही है। न जाने उसने कितनी जगहों पर फॉर्म भरा, इंटरव्यू दिया। लेकिन कभी
उसे जबाब मिलता — “Sorry, we are looking for
more qualified candidate” और कहीं उससे कहा जाता, “We will call you latter.” उसे हर बार निराशा ही हाथ लगी, धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास भी कम होने लगा।
एक दिन उसने
सोचा, "क्या मैं सच में इस शहर में
अपनी जगह बना पाऊँगा?"
कभी वेटर की नौकरी, कभी
सिक्योरिटी गार्ड — लेकिन कुछ टिकता नहीं। एक दिन, सड़क किनारे एक पोस्टर
दिखा — "सेना में भर्ती रैली"। अंदर
से कुछ जागा और उसके मन में एक विचार आया – अगर नौकरी
नहीं मिल रही तो क्यों न सेना जॉइन कर ली जाए। सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद उसे फ़ौज की नौकरी मिल ग़ई।
कड़ी ट्रेनिंग के बाद जब
उसने अपनी यूनिफॉर्म पहनी, तो पहली बार खुद पर गर्व हुआ। वह घर गया तो उसके पिता की आँखों में आँसू थे।
“बाबूजी, अब बेटा देश की सेवा करेगा।”
लेकिन जब सौरभ की पोस्टिंग कश्मीर में हुई, तो वह
अनजान था उस ज़मीन की हकीकत से। वहाँ उसकी नजदीकी महसूस
हुई उस जगह से, जहाँ जिंदगी और मौत की सीमा हर
समय बहुत पतली होती है।
कारगिल युद्ध छिड़
गया। एक रात, मिशन पर जाते समय उसके साथियों ने दुश्मनों के लिए दलदल तैयार किया। उस दलदल में कई पाकिस्तानी सैनिक फंसे और अपनी जान गंवा बैठे।
उसके सामने खून बहते सैनिक और मरते हुए लोग थे, जिन्हें वह कभी भूल नहीं पाया। वह रात किसी फिल्म से कम नहीं थी — गोलियों की आवाज़, बर्फ
में लहूलुहान सैनिक, मरते हुए चेहरे। वहां की बर्फ, बंदूकें, और हर
पल मौत का डर — उसके स्वाभाव में धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगा।
भारत युद्ध जीत गया, लेकिन वह
अपने अंदर सब कुछ हार गया। PTSD — वो नाम जिसे वह समझ नहीं सका, लेकिन
उसका असर उसने महसूस किया।
कम बोलना, नींद
में चिल्लाना, खुद से डर जाना। डॉक्टर ने कहा — “उसे काउंसलिंग की जरूरत है।”
सेना ने उसे मेडिकल
डिसचार्ज दे दिया। अब वो न नौकरी में था, न फौज में। लेकिन सैलरी हर
महीने आती रही — जैसे जले हुए पत्तों पर फूल रख दिए गए हों।
सौरभ की पत्नी सुनीता और बेटा चिंटू घर पर
उसका इंतजार कर रहे थे। लेकिन जब वह लौटा, तो वह सौरभ नहीं था।
सौरभ के लिए यह आखिरी
धक्का था। उसने शराब पीना शुरू किया।
दिन भर वह इधर-उधर भटकता
और शाम होते ही एक पार्क में जाकर बैठ जाता। वहाँ वह काफी देर तक बैठा रहता, पार्क
बंद करने के समय जब पार्क का संतरी उसके पास आता तब वह वहाँ से उठकर घर जाता। एक
दिन जब सौरभ पार्क में बैठा था उसके पास शारदा नाम की एक विधवा महिला आई।
उसके चेहरे पर दया और दृढ़ता दोनों थे। आते ही उस महिला ने सौरभ से पूछा,
शारदा ने कहा — “मैं विधवा
हूँ, एक बेटा है। चाहो तो मेरे छोटे से घर में रह सकते हो। शर्त बस इतनी है कि
किराया दोगे, और शराब नहीं पिओगे। अगर तुम्हें मंजूर हो तो ठीक बरना कोई बात नहीं।”
सौरभ को जीवन में पहली बार
ऐसा लगा कि किसी ने उसके बारे में कुछ जाने बिना ही उसे अपनाने की कोशिश की है।
सौरभ अब दिन में एक
चौकीदारी का काम करता और रात को शारदा के घर आता। वह उसके बेटे गोपाल से
बातें करता, कभी कहानी सुनाता।
चिंटू का जन्मदिन आ रहा
था। सौरभ ने एक छोटी सी चॉकलेट खरीदी। वह पार्क के पास सोसाइटी के हर फ्लैट पर गया, “चिंटू!
तुम्हारा पापा आया है!”
लोग चौंकते, कोई
दरवाज़ा बंद करता, कोई कहता — “यह पागल है!”
सौरभ लौट आया, थका हुआ, टूटा
हुआ।
अगली सुबह लोग पार्क में
टहलने आए तो देखा — सौरभ बेंच पर शांत पड़ा था, वह इस दुनिया को छोड़ चुका था। शारदा दौड़ती
हुई आई। उसकी आँखों से झर्र-झर्र आँसू बह रहे थे।
पुलिस आई, तलाशी
ली, घर का आईडी मिला।
सुनीता और चिंटू आए। चिंटू ने कहा —
सौरभ अब नहीं था, लेकिन
उसकी कहानी थी। गाँव से चला, सपना देखा, लड़ा, टूटा, और अंत
में दुनिया से एक मूक विदाई ले ली।
शारदा अब सौरभ
की याद में हर साल पार्क में मोमबत्तियाँ जलाती है। कभी-कभी गोपाल वहाँ बैठकर कहता
है — “माँ, वो फौजी चाचा फिर कब आएँगे?”
“जिंदगी में अगर सपने टूट जाएँ, तो खुद को भी टूटने मत दो।
जिंदगी एक जंग है और हर जंग की एक कीमत चुकानी होती है, लेकिन
सबसे बड़ी हार तब होती है जब हम खुद को भूल जाते हैं।”
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