भागमभाग भरी जिंदगी।

 

                                                        


वह वक्त और था, 

जब इन आँखों ने 

देखे थे, सुन्दर सपने।


फिर वक्त बदलता रहा

और, आँखों के सपने,

बनकर रह गए सपने।


सोंच बड़ा इतना था मेरा, 

सब साथ रहें एक आँगन में।

सिकुड़ गए वह सिमट गए हैं, 

रह गए शेष,सबके दामन में।


दहलीज लाँघकर आँगन का,

किए तार-तार, सारे सपने।

भूल गए औरों की जरूरत,

बस याद रहा, सारे अपने।


वह युग कितना सुन्दर था,

जब घर के एक ही आँगन में, 

सब साथ रहा करती थीं,

वहीं माँ,चाची और दादी भी।


सुख-दुख को सब एक साथ

मिल, बाँट रहे थे आपस में।

चैन की वंशी बजा रहे सब,

पल काट रहे थे आपस में।


अब गलियारा सूनी लगती है,

सूने लगते हैं, वह सपने सारे।

शहरों की इस चकाचौंध में, 

बिखर गए अब, अपने सारे।


कर्तव्य बोध हम भूल चुके हैं,

अब माँ भी परायी लगती है ।

गुजरा हसीन पल याद आता,

वह भी दुखदायी लगती है ।


अब लौट चलें उन राहों पर,

जो बड़ी ही प्यारी लगती थी।

गैरों के थे वह बाग-बगीचे,

फिर भी हमारी लगती थी।


एक साथ मिल बैठें हैं सब,

कहकहा लगाएँगे जोरों का।

इस भगमभाग से दूर रहेंगे,

अवाज न आए, शोरों का।


घर से दफ्तर, दफ्तर से घर।

बस यही हमारी गति बची।

डूब गए आकंठ स्वार्थ हम,

बस स्वार्थ रही,न मति बची।

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