अधूरी शादी - एक अमर प्रेम कथा।

अर्जुन एक समझदार और मेहनती इंसान था। वह अपने माता-पिता का इकलौता संतान था। उसके पिताजी एक समृद्ध किसान थे। उनके पास कई एकड़ जमीन था। वह उस जमीन पर खुद ही खेती किया करते थे। इस काम में उनकी मदद उनके कुछ नौकर-चाकर किया करते थे। जिन्हें उन्होंने परमानेंट इसी काम के लिए रखा हुआ था। खेती करने के लिए उनके दरवाजे पर दो जोड़ी बैल हमेशा से रहा करते थे। इसके अलावा आधुनिक संसाधन के रूप में उनके पास ट्रेक्टर और सिंचाई के लिए बोरिंग भी थी। परिणामस्वरूप खेतों से अच्छी उपज वह ले पाते थे। उनके पास किसी प्रकार की कोई कमी न थी। वह उदार प्रवृति के लोग थे, इसलिए वह जरूरतमंदो की मदद अक्सर ही किया करते थे। जरूरतमंदो के अलावा उनके चाहने वालों की भी संख्या अच्छी खासी थी और वे सब अर्जुन के पिता के आस पास ही मंडराते रहते थे।


परन्तु अर्जुन को इस सबसे कोई मतलब नहीं रहता था। वह एक मस्तमौला किस्म का, मगर नेकदिल इन्सान था। वह कॉलेज में पढता था। जिससे वह प्रायः शहर में ही रहता था। उस शहर में उसके अपने खुद के ही मकान थे। उसके माँ-पिताजी खेती बाड़ी के चक्कर में गाँव में ही रहा करते थे। सारी संपत्ति उसके पिताजी ने खुद ही अर्जित की थी। यही कारण था कि उन्हें अपनी सम्पति से ज्यादा लगाव था और वे लोग गाँव में ही रहते थे। इसके अतिरिक्त उनका परिवार संयुक्त परिवार था। परिवार में उसके पिताजी के अलावा उनके दो छोटे भाई, उनका परिवार और उसके दादा-दादी भी साथ ही रहा करते थे। घर के तरक्की में सब मिलकर योगदान देते थे। जिससे उनका परिवार दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता जा रहा था।


जब परिवार में तरक्की होती है तो चाहने वालों के आलावा इर्ष्या करने वाले भी पैदा हो जाते हैं। ऐसा ही एक व्यक्ति उनके पड़ोस में भी रहता था। उसकी आर्थिक स्थिति यथावत थी परन्तु अर्जुन के परिवार की तरक्की बढती ही जा रही थी जो उसके अंतर्मन को चोट पहुँचाता था। वह प्रायः इनलोगों से चिढ़ता ही रहता था। शायद इसलिए उसके परिवार की तरक्की नहीं हो पाती थी। उस परिवार में कर्मठ के बजाए कामचोर लोग ज्यादा रहते थे।


अर्जुन शहर में अकेला ही रहता था। जिससे उसे हर चीज की आजादी थी, कोई रोकने वाला नहीं था। फिर भी वह बिगडैल नहीं था। उसके दिल में औरों के प्रति प्रेम और लगाव था। वह अपने माता-पिता का प्रिय संतान होने के साथ-साथ उनका भक्त भी था। वह उनकी हर बातों को उनका आदेश समझ कर शिरोधार्य करता था। वह शक्ल सूरत से सुन्दर तो था ही, साथ में पढाई में भी अपने क्लास में हमेशा अव्वल रहता था। उसके पास खर्च करने के लिए पैसों की कमी न थी। इसलिए उसके कॉलेज की लडकियाँ उसपर दिलोंजान से फ़िदा रहती थी। परन्तु वह किसी को भी घास नहीं डालता था। वह लव मैरिज के बजाए अरेंज मैरिज को पसंद करता था। वह अपने माँ-बाप पर पूरा भरोसा करता था। उसका मानना था कि माँ-बाप हमेशा बच्चों के हित की बात ही करेंगे। इसलिए वह लड़कियों से प्रायः दूर ही रहता था।


मगर समय का चक्र चलता रहता है, स्थितियाँ बदलती रहती है। कभी-कभी आदमी जो न चाहता है वह अचानक ही घटित हो जाता है और जो चाहता है लाख प्रयास करने के बावजूद भी नहीं हो पाता है। उसके ही कॉलेज में एक नई लड़की आई थी जो एक दिन आचानक उससे टकरा गयी। उसका नाम सुष्मिता था। हुआ यूँ कि अर्जुन क्लास के बरामदे से गुजर रहा था, जैसे ही वह लाइब्रेरी के गेट के पास पहुंचा सुष्मिता लाइब्रेरी से निकल रही थी, टकरा गयी। उसके हाथ से किताब जो अभी-अभी उसने लाइब्रेरी से जारी करवाया था, छिटककर नीचे गिर गया। 

    


अर्जुन ने झुककर उसकी किताब उठाई और माफ़ी माँगते हुए उसे किताब वापस कर दी और आगे बढ़ गया। उसने सुष्मिता से माफ़ी
माँगने के अलावा कोई बात नहीं की। सुष्मिता को उसकी यह अदा बेहद पसंद आई।


अब तो यह सिलसिला चल निकला, रोज कहीं न कहीं मुलाकात हो ही जाती थी। दोनों की नजरें आपस में टकरा ही जाती थी। पर बात नहीं होती थी। अर्जुन सुष्मिता को तिरछी नजरों से देख जरूर लेता पर कोई बात न करता। जिससे सुष्मिता के मन में उसके प्रति आकर्षण बढ़ता गया। उसने सोंचा कि अर्जुन उससे बात न करता है तो न सही। वह खुद ही उससे किसी दिन बात जरूर करेगी। और वह अवसर भी एक दिन उसे मिल ही गया जिसका उसे इंतजार था।


जैसे ही वह अपने क्लासरूम से निकली उसकी नजर अर्जुन पर पड़ी, वह उधर ही आ रहा था। सुष्मिता के ख़ुशी का ठिकाना न रहा। वह मन ही मन काफी खुश हो रही थी। उसने तो ठान लिया कि आज वह हर हाल में अर्जुन से बात कर के रहेगी। वह उसे आज इग्नोर नहीं करने देगी। जैसे ही वह पास आया, उसने कहा, “हेलो, कैसे हैं आप।“


अर्जुन ने अनमने ढंग से जबाव दिया, “ मैं ठीक हूँ और आप कैसी है।“


“मैं भी ठीक हूँ। क्या मैं आपका कुछ समय ले सकती हूँ?” सुष्मिता ने पूछा।


“हाँ..हाँ.. क्यों नहीं। बताईए मैं आपकी क्या हेल्प कर सकता हूँ?“ अर्जुन ने कहा।


“दरअसल बात ऐसी है, हम जब पहली बार मिले वह मुलाकात अनायास ही हुई। एक-दूसरे से टकराए तो जरूर मगर हमारी कोई बात न हुई। उसके बाद भी कई बार हमारी नजरें एक-दूसरे से मिली पर बात न हो सकी। आखिर इसकी वजह क्या हो सकती है, क्या मैं जान सकती हूँ। क्या आपको लड़कियों से बात करना पसंद नहीं है या आप जान बूझकर मुझे इग्नोर करने की कोशिश करते हैं।“


“ऐसी भी कोई बात नहीं है।“ अर्जुन ने सुष्मिता से कहा और उससे बचकर निकलने की कोशिश करने लगा।


“अगर आपकी बात पूरी हो गयी तो क्या मैं चलूँ?” अर्जुन ने पुछा।


“रुकिए श्रीमान। आप और हम दोनों एक दूसरे से मिल चुके परन्तु न तो आप मेरा नाम जानते हैं और न ही आपका मैं।“ सुष्मिता ने कहा।


उसने कहा,”मैं अर्जुन, इस कॉलेज में थर्ड इयर का स्टूडेंट हूँ और आप?”


“मेरा नाम सुष्मिता है और मैंने अभी-अभी कॉलेज ज्वाइन किया है।“


“अच्छा तो हम चलते हैं” और कहकर चला जाता है।


धीरे-धीरे समय बीतता रहा। दोनों एक दूसरे से मिलते, औपचारिकता पूरी होती मगर कुछ खास बात न होती। परन्तु दोनों में एक दूसरे के प्रति आकर्षण जरुर बढ़ रहा था। अर्जुन के आखिरी साल आ गया था, उसका इम्तिहान भी हो गया था। रिजल्ट का इंतजार था और एक दिन रिजल्ट भी प्रकाशित हो गया। अर्जुन अच्छे नम्बरों से पास हो गया था। संयोग से उस दिन उसकी मुलाकात सुष्मिता से हुई और उसने उसे बता दिया कि वह अच्छे नम्बरों से ग्रेजुएशन कम्पलीट कर गया है।


उसे जानकर ख़ुशी तो हुई परन्तु वह ख़ुशी क्षणिक ही थी। उसे इस बात का अहसास होने लगा कि अब उसकी मुलाकात अर्जुन से नहीं हो पाएगी। और उदास हो गयी। अर्जुन उसकी एक्सप्रेशन को समझ उससे पूछा कि “क्या आपको यह जानकर ख़ुशी नहीं हुई।“


“मुझे ख़ुशी तो बहुत हुई परन्तु दुःख इस बात का हो रहा है कि मैं अब आपसे नहीं मिल पाऊँगी। हमारी यह मुलाकात अब केवल याद बनकर ही रह जाएगी।“ सुष्मिता ने कहा और कहते हुए आगे बढ़ गयी अपने आँसुओं को छिपाने के लिए।


अर्जुन उसकी भावना को समझ चुका था। कहीं न कहीं उसके मन के अन्दर भी एक अहसास जन्म ले चुका था परन्तु बिना व्यक्त किए वह भी आगे बढ़ गया।


फिर एक दिन वह अपना डाक्यूमेंट्स कलेक्ट करने कॉलेज आया। उसकी आँखे सुष्मिता को तलाश रही थी, परन्तु वह कहीं न दिखी। वह उदास हो गया। उस दिन उसे लगा कि वह भी सुष्मिता से प्यार करने लगा है। पर अब उसकी मुलाकात उससे नहीं हो सकेगी, यह सोंचकर वह भी दुखी हो गया। मगर उसके दिल ने उसे समझाया कि सुष्मिता न सही कोई और ही सही, तुम्हें जरूर मिल जाएगी। तुम्हारा लक्ष्य अभी सुष्मिता नहीं बल्कि तुम्हारा भविष्य है। इसके बाद वह कॉलेज से निकल गया।


अर्जुन कॉलेज से निकलने के बाद आगे की पढाई के लिए उसी शहर के दूसरे कॉलेज में एडमिशन लेता है। परन्तु उसका मन अब वहाँ नहीं लगता था। वह गाहे-बगाहे अपने पुराने कॉलेज में सुष्मिता की एक झलक पाने के लिए आ जाया करता था। वह कभी उसे दूर से देख लेता परन्तु कभी वह उसे नहीं भी दिखती तो उस दिन वह उदास होकर लौट जाता था।


इसी दौरान गर्मियों की छुट्टियों में अर्जुन गाँव लौट आया। संयोगवश सुष्मिता भी गाँव आ चुकी थी। एक दिन सुष्मिता के माता-पिता सुबह-सुबह अपने बैठक में बैठे चाय पी रहे थे। उन्होंने आपस में विचार किया कि अब बेटी बड़ी हो गयी है इसलिए उसकी शादी कर देनी चाहिए। उन्हें किसी ने बताया था कि पड़ोस के गाँव में एक धनी परिवार में एक लड़का है। उन्होंने उस परिवार के बारे में, परिवार के उस लड़के के बारे जानकारी प्राप्त की। फिर उन्होंने सोंचा कि अगर उस लड़के के साथ उनकी बेटी की शादी हो जाए तो बेहतर रहेगा। उन्होंने सुष्मिता को इसके बारे में बताना उचित समझा, इसलिए अपने पास बुलाया।

        


सुष्मिता ने आते ही पूछा, “ पापा आपने बुलाया मुझे।“


“हाँ बेटी! अब आप बड़ी हो गयी हैं इसलिए मैं चाहता हूँ कि अब आपकी शादी कर दी जाए।“ उसके पापा ने कहा।


सुष्मिता सन्न रह गई। उसने डरते हुए पापा से कहा, “पापा, अभी तो मेरी पढाई भी पूरी नहीं हुई है।“


“पढाई तो शादी के बाद भी की जा सकती है।“ उसकी माँ ने उससे कहा।


अर्जुन के घर पहुँचकर सुष्मिता के माता-पिता ने अपनी बेटी का विवाह अर्जुन से तय कर दिया। दोनों गाँवों के बीच एक अच्छी खासी समझ थी, और दोनों परिवारों में इस रिश्ते को लेकर खुशी थी।


शादी के सभी रस्में तय हो चुकी थीं, और तारीख भी फाइनल हो चुकी थी। जब अर्जुन और सुष्मिता को पता चला कि वे दोनों ही एक-दूसरे से शादी करने वाले हैं, तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। दोनों अपने-अपने घरवालों के फैसले से खुश थे।


शादी का दिन आ गया। पूरे गाँव में खुशी का माहौल था। लोग सजधज के तैयार हो रहे थे, और अर्जुन की बारात सुष्मिता के गाँव के लिए रवाना हो चुकी थी। सब कुछ जैसे सधा हुआ था, और किसी को कोई परेशानी नजर नहीं आ रही थी। अर्जुन और सुष्मिता एक-दूसरे के बारे में ख्वाबों में खोए हुए थे। वे सोच रहे थे कि अब उनके जीवन की नई शुरुआत होने वाली है।


लेकिन जो कुछ होने वाला था, वह किसी ने सोचा भी नहीं था। जैसे ही बारात सुष्मिता के घर के दरवाजे तक पहुँची, अचानक सब कुछ बदल गया।


शादी की रस्में चल रही थीं और दोनों परिवार खुशी-खुशी शहनाई की आवाज़ में खोए हुए थे। ठीक उस वक्त, जब सिंदूरदान की रस्म चल रही थी, अचानक कुछ गुंडे और बदमाश घर के दरवाजे पर आ पहुंचे। इन बदमाशों ने घर को चारों ओर से घेर लिया और ताबड़तोड़ गोलियाँ चलानी शुरू कर दी।


लोग घबराए हुए थे, और हर कोई जान बचाने के लिए इधर-उधर दौड़ रहा था। अर्जुन भी इस हंगामे से बचने के लिए भागने की कोशिश कर रहा था, लेकिन एक गोली उसकी छाती में लग गई। वह वहीं गिर पड़ा और खून से लथपथ हो गया।


सुष्मिता, जो उस समय अर्जुन के पास ही खड़ी थी, घबराई हुई दौड़ी और अर्जुन को खून से सने देख चीख पड़ी। हर कोई हड़बड़ी में था। तभी डाकुओं के बीच से उनका सरदार आगे आया और सुष्मिता को झटका देकर अर्जुन को उससे छिनकर अपने साथ ले गया। मगर इसी क्रम में उस सरदार की पगड़ी उसके माथे से खुल गयी जिसमें से उसके लम्बे बाल बाहर निकल दिखने लगे। परन्तु जल्दी से उसने अपनीं पगड़ी ठीक की, अर्जुन को अपनी जीप में डाला और वहां से रफ्फूचक्कर हो गए।  


सारा माहौल पूरी तरह से बदल चुका था। कुछ देर पहले जहाँ शादी की शहनाई बज रही थी वहीँ अब मातम पसरा हुआ था। लोग यह सोंचने को विवश थे कि डाकू का सरदार एक औरत तो नहीं थी। अगर वह औरत थी तो उसका अर्जुन से या फिर उसके परिवार वालों से क्या वास्ता? जितनी मुँह उतनी बातें। पर किसी को भी कोई उत्तर नहीं मिल पा रहा था। आखिर में बारात बिना शादी के और बिना दूल्हा-दुल्हन के वापस चली गयी।


अर्जुन के पिता पूर्ण रूप से व्यथित थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर में दोष किसका है? उनका खुद का, अर्जुन का या फिर सुष्मिता के घर वालों का?


कानूनी प्रक्रिया शुरू की गयी  और पुलिस ने घटना की जाँच शुरू की। किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि इन गुंडों का क्या उद्देश्य था। लेकिन एक बात स्पष्ट थी कि यह एक सुनियोजित हमला था, क्योंकि किसी ने दरवाजे पर गोलीबारी की और फिर बिना किसी उद्देश्य के, बिना किसी लूटपाट के सिर्फ अर्जुन को लेकर वहां से भाग गए।


कुछ दिनों के उपरान्त सुष्मिता के घरवालों ने निश्चय किया कि अब वे उसकी शादी कहीं और कर देंगे। वे इस बात को मानने को विवश थे कि उनकी बेटी अभी भी अनब्याही है। इसलिए उसकी ज़िंदगी आगे बढ़नी ही चाहिए। परन्तु सुष्मिता ने इसका खुलकर विरोध किया।


सुष्मिता ने अपने माता-पिता से कहा, "मैं किसी और से हरगिज भी शादी नहीं करूंगी। क्योंकि मैं मानती हूँ कि अर्जुन ही मेरा पति है। भले ही उसने मेरे माँग में सिंदूर नहीं डाला है, परन्तु मैंने उसे अपने मन, वचन और अपनी आत्मा से उसे अपना पति मान लिया है और वह ही मेरा पति रहेगा। उसके अलावा मेरे जीवन में अब किसी का कोई स्थान नहीं हो सकता है।"


यह सुनकर उसके माता-पिता चौंक गए, और उन्हें समझ नहीं आया कि उनकी बेटी ऐसा क्यों कह रही थी। उन्हें लग रहा था कि अर्जुन अब इस दुनिया में नहीं है। इसलिए सुष्मिता को अपनी जिंदगी आगे बढ़ानी चाहिए। लेकिन सुष्मिता का दिल कुछ और ही कह रहा था।


"मेरे लिए अर्जुन अब भी जिन्दा है। मेरी शादी अधूरी रह गई, लेकिन मैंने उसे अपने पति के रूप में स्वीकार किया है, और यही मेरे जीवन का सत्य है," सुष्मिता ने कहा।


उसके इस निर्णय ने सबको चौंका दिया। समय बीतता गया, लेकिन सुष्मिता का फैसला नहीं बदला। उसने न तो किसी और से विवाह किया और न ही अर्जुन को भुलाया।


अर्जुन का क्या हुआ, यह कोई नहीं जान पाया। वह जिंदा था या नहीं, यह एक रहस्य ही बना रहा।


लेकिन सुष्मिता ने अपने प्रेम को अमर बना दिया। उसने साबित कर दिया कि प्रेम केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि आत्मिक बंधन का नाम है। उसने यह भी सिखाया कि जब प्यार सच्चा हो, तो वो कभी अधूरा नहीं होता— बेशक साथ ही क्यों न छूट जाए।

 

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