मधुर–मिलन

 

                                                        

मधुर–मिलन

 

हे रूपवती !
क्यों निश्छल-निष्पंद,
बैठी हो इस निर्जन वन में |
कैसी ख़ुशी, कैसा विषाद,
लेकर आई निज अंतर्मन में |
 
हे सुभगे !
कुछ बोल भला |
क्या कष्ट दिया तुमको जग ने?
क्यों व्यथित हुआ है उर तेरा,
जीवन के इस छोटे पल में?
 
कह दे अतीत की बात मुझे,
कुछ मदद तेरी कर पाउँगा |
तेरे उर में बसी व्यथा को मैं,
कहो तो, अस्ताचल ले जाउँगा |
 
क्या मंजिल मेरी वहीं तक थी?
अनजान पथिक के उस पथ का |
धर्म सारथी कर्म अश्व है जिसका,
इस छोटे से जीवन रथ का |
 
सतत उत्सर्ग कर जीवन में¸
यदि अपनों को खुश रख पाता मैं |
चख पाता नहीं अवसाद कभी,
यदि सफल साहचर्य निभाता मैं |
 
सत्य सिद्ध और लक्ष्य सार्थक,
हो जाता है उस नर तन का |
सदा महकता रहे बाग-बगीचा,
झड़े न सुमन कभी उपवन का |
 
घर का गलियारा सूना लगता है,
और सूना वह लगता अंगना है |
विश्वास मेरे मन में है अबतक,
शायद मेरा भी कोई अपना है |

वर्षों बीते प्रियतम बिछड़ गए,
अब पिया मिलन एक सपना है |
बैठ अकेली विपिन–कुंज में,
मुझे नाम प्रियतम का जपना है |
 
होते ही कोई कष्ट अगर,
या व्यथित होते निज अंतर्मन |
बैठी रहती तब आस लिए एक,
होंगे प्रियतम से "मधुर-मिलन" |
 

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