ऊपरवाले ने जब वक्त मुकर्रर कर दिया है,
तो उससे पहले, कभी जलजला नहीं आएगा।
समुंदर अपनी सीमा में रहकर उफान लेता है,
उससे डरकर कोई आँख, छलछला नहीं पाएगा।
कुछ लोग किनारे में खड़े रहकर मजा लेते हैं।
समंदर में उतरने वाले कभी तो डूब सकते हैं।
वह स्वाद क्या पाएगा, जो पेड़ पर ही न चढ़े।
जिसने भी चढ़ लिया, वही तजा फल खाएगा।
वह घर तुम्हारा है, कोई मकान नहीं है।
वहाँ बिकता है सब, पर दुकान नहीं है।
लोग आते हैं, मोल चुकाते हैं, चले जाते हैं।
मजबूरियाँ बिक जाती, जो सामान नहीं है।
वह रिश्ता बिखर जाता है, जहाँ विश्वास न होता है।
जहाँ स्वार्थ गहरा होता है, वहाँ आभास न होता है।
हर सीमा को हम लाँघकर, खुद पार चले जाते हैं।
अंधकार जहाँ शेष है अबतक , प्रकाश न होता है।
जब वक्त कयामत का आता, तन्हाई ही रह जाती है।
जैसे ही वक्त गुजरता है, बस परछाई ही रह जाती है।
फिर ढूँढती है खामोश निगाहें, अपने और पराए को।
अपने कहीं नजर नहीं आते, रूसवाई ही रह जाती है।
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