माँ का लाडला

 

मेरे पड़ोस में रोहित अपनी माँ, सविता देवी के साथ रहने आया। शहर में रहने का अनुभव उसके लिए नया था। क्योंकि इससे पहले वह कभी किसी शहर में रहा नहीं था सविता देवी ने अपने पति के निधन के बाद अपने बेटे के बेहतर भविष्य के लिए यह कदम उठाया था। वे दोनों स्वभाव से मिलनसार और नेक थे, जिससे पड़ोसियों के साथ उनकी घनिष्ठता बढ़ती गई। धीरे-धीरे, रोहित और उसकी माँ का हमारे परिवार से भी गहरा संबंध बन गया। रोहित ने हमारी माँ को 'आंटी', मेरी बहन को 'दीदी' और मुझे 'भैया' कहना शुरू कर दिया।


हर त्योहार हम सब साथ मिलकर मनाते थे, एक साथ ही खाना-पीना होता था, जिससे एक दूसरे के प्रति विश्वास और बढ़ गया था। रोहित एक अच्छा लड़का था और पढ़ने में तेज था। इसलिए वह हमेशा अच्छे नंबरों से अपने क्लास में पास किया करता था। वह स्वभाव से संकोची था, इसलिए वह लोगों से कम मिलता-जुलता था। हमेशा वह अपनी पढ़ाई और घर के कामों में ही व्यस्त रहता था।

माँ का लाडला

परिवार में आमदनी का कोई खास स्रोत न होने के कारण वह ट्यूशन करता था और उसकी माँ दूसरे के घरों में काम करती थी, जिससे दोनों का जीवनयापन हो रहा था। जैसे-जैसे वह पढ़ाई में आगे बढ़ता गया, अपने-आप में पहले से ज्यादा व्यस्त रहने लगा। नतीजतन, वह अपनी माँ का ख्याल कम करने लगा। उसकी माँ भी उसे घर के हालात के बारे में कुछ ज्यादा नहीं बताती थी। वह अपने बेटे की पढ़ाई और उसकी दिनचर्या में बाधक नहीं बनना चाहती थी।


एक दिन जब वह अपनी दिनचर्या समाप्त कर घर लौटा, उसने देखा कि उसकी माँ बीमार हालत में बिस्तर पर लेटी है। घबराकर उसने माँ से पूछा, "माँ, क्या हुआ आपको?"


माँ ने उसको परेशान देखकर कहा, "कुछ नहीं बेटा, बस थोड़ी सी तबियत ठीक नहीं है।"


परंतु वह इस बात को अच्छी तरह से समझ रहा था कि उसकी माँ उससे कुछ छुपा रही है। किसी अनहोनी की आशंका से उसका मन घबरा रहा था। वह अपनी माँ से बार-बार डॉक्टर के पास चलने के लिए आग्रह कर रहा था। "माँ, चलिए, मैं आपको डॉक्टर के पास लेकर चलता हूँ।"


"अरे बेटा, तुमको इतना घबराने की जरूरत नहीं है, रात में आराम से सो जाऊँगी, तब सारी परेशानी दूर हो जाएगी।"


काफी मनाने-समझाने के बाद जब उसकी माँ नहीं मानी, तब मजबूरी में उसे भी टालना पड़ा। वह जाकर बिस्तर पर लेट गया, पर नींद उसकी आँखों से काफी दूर थी। फिर भी वह करवट बदलता रहा, मगर वह सोना भी नहीं चाहता था, क्योंकि उसके अलावा और कोई भी नहीं था जो उसकी माँ का ख्याल रख सके।


आधी रात होते ही माँ की हालत बिगड़ने लगी। अब उसके पास अपनी माँ को डॉक्टर के पास ले जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। उस इलाके का वातावरण बिलकुल शांत हो चला था। उसके पास अस्पताल तक पहुँचने के लिए अपनी कोई भी सवारी नहीं थी। फिर भी उसने अपनी हिम्मत नहीं हारी। माँ को कंधे पर उठाया और सड़क की ओर बदहवास होकर चल पड़ा। घर से मुख्य मार्ग, जहाँ से उसे कोई सवारी मिल सकती थी, की दूरी लगभग एक किलोमीटर के आसपास थी। उसे इस बात का इल्म तो था कि अभी उसे कोई सवारी शायद ही मिल पाए, परंतु उसकी मजबूरी थी। उसे हर हाल में अपनी माँ को लेकर जल्दी से जल्दी अस्पताल तक पहुँचना था। उसके घर से अस्पताल भी लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर था।


वह सड़क पर पहुँच चुका था। उसे कोई भी सवारी नहीं मिल रही थी। उसकी बेचैनी पल-पल बढ़ती जा रही थी। काफी इंतजार करने के बाद उसे दूर एक गाड़ी की हेडलाइट की रोशनी नजर आई। उसके मन में उम्मीद की एक किरण जगी कि अब हम अस्पताल पहुँच जाएँगे। मगर जैसे-जैसे वह गाड़ी नजदीक आती गई, उसका हौसला टूटने लगा, क्योंकि वह एक बड़ी गाड़ी थी। उसने उस गाड़ीवाले को हाथ देना उचित नहीं समझा। उसे मालूम था कि अमीर लोग गरीब की मदद नहीं करते हैं। इसलिए वह अपनी माँ को अपने कंधे पर लादे हुए थोड़ा किनारे हट गया।


मगर उसके आश्चर्य का तब ठिकाना न रहा, वह गाड़ी उसके पास आते ही रुक गई। गाड़ी के मालिक ने दूर से ही उसे देख लिया था। उन्हें इस बात की समझ आ गई थी कि यह आदमी इतनी रात में सड़क के किनारे किसी मजबूरी में ही खड़ा है। जब थोड़ा पास आने पर गाड़ीवाले ने उसे अपनी माँ को कंधे पर लिए खड़ा देखा तो उन्हें समझते देर न लगी। उन्होंने उसके पास आते ही अपनी गाड़ी रोक दी। सारी स्थिति जानने के बाद उन्होंने उसे और उसकी माँ को अपनी गाड़ी में बिठाया और खुद लेकर अस्पताल की ओर चल पड़े। वह इस इलाके के एक रसूखदार व्यक्ति थे। उन्हें देखते ही डॉक्टर अपनी कुर्सी छोड़कर उठ खड़ा हुआ। सारी बात जानने के बाद डॉक्टर ने उसकी माँ की जाँच करनी शुरू कर दी। डॉक्टर के जाँच-पड़ताल करने के बाद उसे अपनी माँ को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।


कई दिनों तक इलाज चलता रहा। उसके पास जो कुछ जमा-पूंजी थी, अपनी माँ के इलाज में लगा दिया, फिर भी अपनी माँ को नहीं बचा सका। उसकी माँ को कैंसर था, वह दुनिया छोड़ चुकी थी और वह अनाथ हो गया।


माँ के निधन के बाद, रोहित के जीवन में एक खालीपन आ गया। वह अकेला महसूस करने लगा, लेकिन उसने अपनी माँ के सपनों को पूरा करने का संकल्प लिया। उसने अपनी पढ़ाई में और भी मेहनत की और ट्यूशन के साथ-साथ एक पार्ट-टाइम नौकरी भी करने लगा, ताकि अपने खर्चों को पूरा कर सके।


हमारे परिवार ने भी उसे सहारा दिया। मेरी माँ ने उसे अपने बेटे की तरह अपनाया और मेरी बहन ने उसे पढ़ाई में मदद की। धीरे-धीरे, रोहित ने अपनी मेहनत और लगन से कॉलेज की पढ़ाई पूरी की और एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी प्राप्त की।


नौकरी लगने के बाद, रोहित ने अपनी माँ के नाम पर एक चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की, जो कैंसर से पीड़ित गरीब मरीजों की मदद करता था। वह नहीं चाहता था कि किसी और को उसकी माँ की तरह इलाज के अभाव में दम तोड़ना पड़े

माँ का लाडला

इस दुनिया में अच्छे लोगों की कमी नहीं है कोई न कोई मुसीबत में साथ देने आ ही जाता है या यों कह लें कि उपरवाले किसी न किसी को फ़रिश्ता बनाकर आपके पास आपकी मदद के लिए भेज ही देता है क्योंकि उससे कुछ भी नहीं छुपा है वह सबकुछ देखता है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार इलाके का एक रसूखदार व्यक्ति आधी रात के समय रोहित की मदद दे लिए उसके पास आ जाते है इसलिए मनुष्य को कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए, बस अपना काम करते रहना चाहिए

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