हम नारी हैं और हम सबकी,
एक सी ही सारी कहानी है।
कोई न अपना घर है हमारा,
जिस माँ ने हमें जन्म दिया है,
वह भी तो पराई बन जाती हैै।
जिस पिता ने हमको पाला है,
हमें उनसे जुदाई हो जाती है।
जिस मिट्टी में हम पले-बढ़े हैं,
जिन गलियों में हमने खेला है।
दिखती है भीड़ हर मोड़ मगर,
स्व जीवन में सभी अकेला है।
पिता के घर जबतक रहते हम,
सब पराई अमानत समझते हैं।
जिस घर में हमें जाना होता है,
वे पराए घर से आई, कहते हैं।
विदा होके जिस घर जाते हम,
उस घर को अपनाना होता है।
उनकी जो भी जरूरत होती है,
सबको अपना बनाना होता है।
हमें भूलना होता मायका को,
वहाँ के सब मेरे रिश्तेदार हुए।
पति के घर में रहने वाले सभी,
मेरे लिए, मेरे ही परिवार हुए।
निर्भरता होती है सदा हमारी,
कभी पिता व कभी पति पर।
सब कुछ होते कुछ न हमारा,
चलते रहते हैं उसी गति पर।
जब हम अपनाते उस घर को,
ससुराल ही घर, मेरा होता है।
चेहरे पर चमक तब छा जाती,
संजो लेते, जो सपना होता है।
यही क्रम चलता है जीवन भर,
हमें परम्परा निभाना होता है।
उस मोड़ तक जब पहुँच जाते,
आनेवालों को बताना होता है।


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