हे अम्बर! तेरे ही आँगन में,
सब मेघ इकट्ठे हो गए हैं।
उनमें से कुछ वही पुराने हैं,
और नए कुछ जुड़ गए हैं।
सदा गरजते गगन में हैं वे,
मगर बरसना भूल गए हैं।
तरस रहे धरती के वाशिंदे,
पर वे हवा में झूल गए हैं।
सोंच रहे वे, यदि गरजे हम।
शायद जन पर, दबाब पड़े।
यदि चुनना हो जब किसीको,
कुछ तो उन पर प्रभाव पड़े।
सेंक रहे हैं अपनी रोटी सब,
कुछ तो हाथ ही लग जाए।
जन मानस सोया है अबतक,
शायद कभी वो जग जाए।
फिकर सभी को इतना है,
कैसे वह कुर्सी मिल जाए।
जबतक ही रहें शांति से रहें,
कहीं कमल न खिल जाए।
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