सकून की खोज




निकल गया था घर से खुद मैं, 

मुझे पता नहीं, कहाँ जाना है।

सोंच रहा था मिले सकून तब,

अपने साथ उसे, घर लाना है।


पर सकून कहाँ जाकर ढूँढू मैं,

कोई तो इसका पता बता दो।

जब सकून न मिला मुझे यदि,

मेरी क्या इसमें खता बता दो।


मैंने ढूँढा है हर गली में जाकर,

उन टेढी राहों और बाजारों में।

मन के अंदर वह छुपा हुआ है,

मैं ढूँढ रहा हूँ, बंद दीवारों में।


जब टटोलना चाहा था मन को,

अंतर्मन में कोई आवाज हुआ।

भटक रहा है क्यों मेरे यार तुम, 

द्रवित मन को ये अंदाज हुआ।


संकेत - सूत्र मिल गया है मगर,

अब प्रश्न है उसे अपनाएँ कैसे?

जब हो प्रसन्नचित अंतर्मन यदि,

तब अपनों से ही बतलाएँ इसे।


अपने तो बस, अपने ही होते हैं।

क्या उनसे भी यह बतलाना है। 

जब रूठ जाए अपने अपनों से,

कुछ भी कर उनको, मनाना है।


स्वारथ से जब प्रीति लग जाती,

अच्छे विचार सब धुल जाते हैं।

मन का द्वेष निखर उठता और

वहाँ प्रेम-प्यार भी घुल जाते हैं।


जब बात रत्ती भर की न होती,

तब पर्वत, विशााल बन जाता है।

कभी-कभी तो कई छोटी बातें,  

बनकर ही कलह ठन जाता है।


सौ कलह के बातों की एक दवा,

कलुषित माहौल नहीं बनने पाए।

स्वार्थ दूर रख, दूजे की कदर हो,

तब खुद से ही प्यार, पनप जाए।


जब प्यार पनप जाए जीवन में,

तब खुद से सकून आ जाएगा।

और नाच उठेगी मन की मयूरी,

मन चैन की वंशी बजा पाएगा।

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