तन्हाई अक्सर रातों को ,
बेचैन ये मन कर जाती है।
जितना दीए में तेल रहे,
उतना ही जलता बाती है।
सबल की अपनी सीमा है,
निर्बल तो उद्वेलित होता है।
भूलकर अपनी मर्यादा को,
भ्रमित व विचलित होता है।
जैसे तरंग उठता सागर में,
लौट वह वापिस आता है।
जब दरिया में सैलाब आए,
तब भूल किनारा जाता है।
कोई वृक्ष लम्बा कितना हो,
और उसकी शाखा नहीं हो।
फल तो दे सकता वह मगर,
नहीं दे सकता है छाया वो।
छाया देनेवाली वृक्षों की,
बड़ी-बड़ी डाली होती है।
दौलत वालों के दिल में,
झाँको तो खाली होती है।
बेशक, संगति दीन की हो,
पर वह विवेक से भरा रहे।
विपदा कोई भी सामने हो,
न साथ छोड़े वह खड़ा रहे।
जल से भरी गगरी हो कोई,
हो शांत साथ वह चलती है।
पर जो भरी नहीं होती वह,
हलचल तब करती रहती है।
कहते हैं कि युद्ध व प्यार में,
सब कुछ जायज ही होता है।
चोट यदि आस्था पर हो,तब
सब कुछ नाजायज होता है।
निंद्रा के आगोश में हो हम तो,
टूटी खाट मखमली लगती है।
भूख शांत करना हो यदि जब,
जूठी पात भली तब लगती है।
फलों से लदा, डाली वृक्ष की,
झुककर जीना सिखालाती है।
पत्थर मारनेवालों को भी वह,
खुद का ही स्वाद चखाती है।
Do leave your comment.