सूरज की तपिश सहकर भी,
तरूवर छाया हमें दे जाता है।
वर्षा की बूँदें सहेजती है धरा,
अमृत जल हमें मिल पाता है।
फल देनेवाला तरुवर खुद का,
फल खुद ही नहीं खा पाता है।
नीर भरी दरिया भी कभी नहीं,
खुद जल संचित कर पाता है।
ममतामयी है यह धरती माता,
हल के नोक से आहत होती है।
फिर भी रहकर बेपरवाह वह,
क्षुधा शांत कर, राहत देती है।
कुदरत ने जो कुछ दिया हमें,
वह खुद के लिए नहीं जीते हैं।
सागर मंथन के बाद सदाशिव,
विष का प्याला भी पी लेते हैं।
मानव जीवन की योनि श्रेष्ठ है,
पर, इस युग में वही अधम है।
लोभ - मोह से ग्रसित रहता है,
लेशमात्र नहीं बचा ही शरम है।
Do leave your comment.