कोरोना ने जुल्म किया है, छीन
लिया सबका रोटी।
उसका भी निवाला छीना
जो भक्षण, करते थे बोटी।
दूर किया अपनों से इसने, क्या दूर
कभी अपने होंगे?
चूर-चूर होकर
बिखरेंगे वो, जो कोरोना के सपने होंगे।
ईश्वर की रचना मानव पर,
बन के कहर है टूट पड़ा।
निर्जीव जगत का प्राणी ये, आफत बनकर
फूट पड़ा।
पर जरा सोंचकर देखें तो, इसे
पाएँगे प्रभु की लीला।
संतुलन धरा का बिगड़ा है, यह दूर उसे करने वाला।
भूल गए सत्कर्म श्रेष्ठ सब,
जिसे ग्रंथों ने बतलाया है।
भारत की पावन भूमि ने, हमको
जीना सिखलाया है।
नीति पुरातन नर तन को,
अपनाना होगा जीवन में ।
विश्वगुरू निश्चय ही बनेंगे, जग के
उजड़े हुए चमन में।
वर्षों से चाहत थी हमें, सरिता हम
स्वच्छ न कर पाए।
ये विपदा है आन पड़ी, आकर अब
निर्मल जल पाएँ।
दूर क्षितिज में खड़ा हिमालय, हमसे खुद
ही कहता है।
हम दोनों के बीच में शायद, बाधा न अब
कोई रहता है।
सब मिलकर संकल्प लें, यह भूमि जो सबसे बेहतर है।
अपनी बिसरी परम्परा को, कायम
रखना श्रेयष्कर है।


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