मध्यम वर्ग


                             
  
                    एक नन्हा मासूम सा बच्चा पूछा, अपने पूज्य पिता से।
             मुझे जरा बतलाओ पापा, यह मध्यम वर्ग क्या होता है?

             सुनकर प्रश्न पुत्र के मुख से, पिता को अचरज घोर हुआ।
             विकट परीक्षा की घड़ी है ये, इसपर चर्चा चहुँ ओर हुआ। 

            माता की इच्छा पूरी करने का, उस पर दबाब गहरा होता।
            फिसल न जाए कदम कहीं भी, पिता का कड़ा पहरा होता।

            मिल जाता संतोष उसे भी, चलो कोई डिग्री तो मिली।
            शुरू भले ज्यादा से न हो, मिल जाए कोई जॉब भली।

            जन्म कहीं होता है उसका, पर कर्म वहाँ नहीं करता है।
            वहीं बीतता जीवन उसका, अंतिम साँसे वहीं भरता है।

            समय बीतने पर ही शायद, वह कोई भी तरक्की पाता है।
            साथ-साथ ही टैक्स रूप में, उसके सिर बोझ ये आता है।

            चाहे कितना दु:ख गहरा हो, चेहरे पर शिकन न होता है।
            मिले नहीं भरपेट ही भोजन, तब भी वह धैर्य न खोता है।

            फिर भी कभी कतारों में जा,भोजन नहीं वह कर सकता।
            जबतक बन पड़ता है उससे,वह अपने जीवन से लड़ता।

            इतना सा कष्ट जो सह लेता, और कभी न आहें भरता है।
            आसान बनाकर मुश्किल को, जीवन उसे जीना पड़ता है।

            हँसते हुए दर्द जो सह लेता, चेहरे की चमक न खोता है।
            उसे मध्यम वर्ग ही कहते हैं, वह पाता नहीं जो बोता है।




















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