दोहा: हे माँ! मुझको ऐसा वर दो,
शरण तुम्हारी सदा मिले।
माफ करो सब भूल हमारी,
छोटे हों चाहे बड़े गिले।
हम आए हैं शरण में, सुनो माता हे मेरी।
रक्षा करो हे माँ, ये दामन
दु:ख से है भरी।
अब लौटकर न जाएँगे, हम
तेरे ही दर से,
तुम ही सँभालो नैया माँ, भँवर में है पड़ी।
धरती को पापियों से, तूने मुक्त है किया।
बढ़ने लगे हैं पाप, फिर भी दूर क्यों खड़ी।
आके दिखाओ महिमा, हम जानते जिसे।
हे माँ! तेरी दुनिया में
कौन, तुमसे है बड़ी।
माँ का ही अक्स तुममें, अब
देखते हैं हम।
मुझको बिठालो गोद अपने, आशा है मेरी।
सह लेंगे सारे गम, वो जो दुनिया ने हैं दिए।
सिवा तेरे बिन कटे न मुझसे, एक भी घड़ी।
हे माँ! तेरे हवाले अब मैं करता हूँ खुद को।
अब थाम लो पतवार, जो तेरे हाथ में पड़ी।


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