शहरों की ओर

 


                                                          

शहरों की ओर

                                                     

ऐ माँ, तेरे आँचल के छाँव को,
मैं छोड़ चला शहरों की ओर ।
तुमने मुझको जीना सिखाया,
मुँह मोड़ चला बहरों की ओर ।
 
गति जहाँ मिल रही थी मुझको,
क्योंकर वह रास नहीं आया है ।
सूरज की ताप से तपता है तन,
बेशक सर ऊपर घनी छाया है ।
कैसे खिलाफ हम हो सकते हैं,
जब सभी चले लहरों की ओर ।
 
हरियाली मिल रही जहाँ मुझे,
टिकना मुनासिब न हो पाया ।
विरानों में आकर हो गए गुम,
विरानी ने मेरा मन भरमाया ।
कहाँ चैन मिलता है किसीको,
मन भ्रमित है मोहरों की ओर।
 
आजादी जो मिली कभी मुझे,
अब वहाँ लौट नहीं सकता मैं ।
जंजीरों में जब मन जकड़ा हो,
बेबस होकर तो नहीं रहता मैं ।
आदत वैसी अब बन गई मेरी,
फिर से चलते पहरों की ओर ।


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.