ऐ माँ, तेरे आँचल के छाँव को,
मैं छोड़ चला शहरों की ओर ।
तुमने मुझको जीना सिखाया,
मुँह मोड़ चला बहरों की
ओर ।
गति जहाँ मिल रही थी मुझको,
क्योंकर वह रास नहीं आया
है ।
सूरज की ताप से तपता है तन,
बेशक सर ऊपर घनी छाया है ।
कैसे खिलाफ हम हो सकते हैं,
जब सभी चले लहरों की ओर ।
हरियाली मिल रही जहाँ मुझे,
टिकना मुनासिब न हो पाया ।
विरानों में आकर हो गए गुम,
विरानी ने मेरा मन भरमाया ।
कहाँ चैन मिलता है किसीको,
मन भ्रमित है मोहरों की ओर।
आजादी जो मिली कभी मुझे,
अब वहाँ लौट नहीं सकता
मैं ।
जंजीरों में जब मन जकड़ा
हो,
बेबस होकर तो नहीं रहता
मैं ।
आदत वैसी अब बन गई मेरी,
फिर से चलते पहरों की ओर ।


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