कैसी दुनिया की रस्म-ए है
,
कैसे-कैसे हैं लोग यहाँ ?
कैसी किसकी किस्मत है,
और कैसे होते संयोग यहाँ ?
गूंजती ठहाके – हंसी किसी
की,
किसी की दबकर रह जाती है |
किसी की होठों पर
मुस्कानें,
आकर वापस चली जाती है |
कोई तन-मन से सुखी यहाँ और,
घेरा है किसी को रोग यहाँ
|
कैसी दुनिया की रस्म-ए है
,
कैसे-कैसे हैं लोग यहाँ ?
किसी के आँगन में, चाँदनी
की,
चंचल छटा उतरती सीधी है |
किसी के गोरे चेहरे को भी,
काले कोहरे ने घेरा है |
कुछ तो जीते आभावों में,
होता न कुछ को भोग यहाँ |
कैसी दुनिया की रस्म-ए है
,
कैसे-कैसे हैं लोग यहाँ ?
दिया किसी को, खुदा ने खुद ही,
दौलत को छप्पर फाड़कर |
बना दिया कंगाल किसी को,
जीने खातिर, पत्तल चाटकर
|
खुदा ने बाँट दिया वर्गों
में,
हम बँटते हैं, हर रोज यहाँ
|
कैसी दुनिया की रस्म-ए है
,
कैसे-कैसे हैं लोग यहाँ ?
किसी कलाई में चूड़ी सजती
और माथे में, फबता सिंदूर
|
कोई युवती बनती सुहागन,
किसी
बाला की चूड़ियाँ होती चूर
|
कैसी दस्तूर है, इस दुनिया की,
कैसे खेलती किस्मत, खेल यहाँ ?
कैसी दुनिया की रस्म-ए है
,
कैसे-कैसे हैं लोग यहाँ ?
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