नव-वर्ष

                                                            

नव-वर्ष

                                                                                          

पश्चिम को लगता प्यारा है।

जो नव-वर्ष नहीं हमारा है।

वही नव-वर्ष हमारा है जो,

सबकी आँखों का तारा है।

 

जब बागों में फूलें खिलती,

और पेड़ों पर मंजर आते।

कलियाँ तब मुसकाती हैं,

भँवरे भी कर गुंजन जाते।

 

तब खेतों में खड़ी फसलें,

पौध लहलहाती रहती हैं।

नव पल्लव हर्षित होकर,

उन पेड़ों पर जा बसती है।

 

पेड़ की ओट में छुपी हुई

कोयल,तब गायन करती।

शाम का अंधेरा छाते ही,

खग-वृंदें कलरव करती।

 

सूरज भी खुलकर जब,

नभ में आ छा जाता है।

तब शायद ही कोई नर,

रजाई में मिल पाता है।

 

खुशियाँ छाती चहुँ ओर,

दिशा सब मुसकाती है।

वही नव - वर्ष हमारा है,

सबको खुशी दे जाती है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.