पलायन - न लौट सका।

पलायन


छोड़ के आए हम अब यहाँ,

अपनी धरती और गाँव को।

छोड़ा अपने संगी सखा को,

और छोड़ा तरूवर छाँव को।


छोड़ आए हम उन गलियों को,

जहाँ यारों के संग खेला करते।

जब-जब याद वो पल आता है,

घुट-घुटकर यूँ आह भरा करते।

कैसे भूलें हम, उस दरिया को,

जहाँ चलाते थे किसी नाव को।


सबकुछ छोड़कर आ गए हम,

हो गए यहाँ बंद, दीवारों में।

साँस ले रहे दूषित हवा में और,

भटक रहे तंग गलियारों में।

जो कुछ सोंचकर आए थे हम,

उलटा ही पड़ा हर दाव वो।


ऊँची-ऊँची इमारतें हैं, जहाँ

हम सब एक साथ में रहते हैं।

बिछड़ गए हैं उन अपनों से,

जिनको अपना हम कहते हैं।

उलझ गए किसी चकाचौंध में,

जैसे हम पर कोई दबाव हो।


जुदा हो गए हम उस माटी से,

जहाँ जनम लिया है, पले-बढ़े।

सोंचा करता हूँ कल के लिए,

जाकर वहाँ हम, कुछ तो करें।

लौटने को जी चाह रहा पर,

बेड़ियों ने जकड़ा है पाँव को।

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