मैं कौन सा गीत सुनाऊँ जो,
तेरा मन पुलकित हो जाए।
तेरा मन पुलकित हो जाए।
जितना सुंदर ऱाग हो उसका,
उतना मधुर हो उसका बोल?
कर्ण प्रिय संगीत हो जिससे,
मन का हर बंधन देवे खोल।
वैसा ही वह गीत हो जिससे,
तुम भी प्रफुल्लित हो जाए।
मैं कौन सा गीत सुनाऊँ जो,
तेरा मन पुलकित हो जाए।
तेरी हर इच्छा, कामना का,
मुझे कद्र सदा करना होगा।
मुझसे तुम नहीं रूठो कभी,
इस बात से तो डरना होगा।
क्या मैं जतन करूँ जिससे,
तेरा मन तो हर्षित हो जाए।
मैं कौन सा गीत सुनाऊँ जो,
तेरा मन पुलकित हो जाए।
तुमको बड़ा अच्छा लगता है,
जब दो-चार पास मंडराता है।
मौकापरस्त वह लोग होते हैं,
जिनकी बातें, तुम्हें भाता है।
उनकी हर चिकनी बातों पर
तुम जो खुद गर्वित हो जाए।
मैं कौन सा गीत सुनाऊँ जो,
तेरा मन पुलकित हो जाए।
सच्ची बात सदा कडवी होती,
भय व्याप्त हृदय में करता है।
अंतर्मन ही जब कलुषित हो,
तब पग-पग पर डर लगता है।
अवचेतन मन में दबी धारणा,
जिससे मन शंकित हो जाए।
मैं कौन सा गीत सुनाऊँ जो,
तेरा मन पुलकित हो जाए।
न सत्य कभी स्वीकार तुम्हें,
तेरे तल में तम ही बसता है।
जब नभ में घटा गरजता है,
विरहन के मन को डसता है।
जब अपने ऊपर भरोसा हो,
कण-कण विस्मित हो जाए।
मैं कौन सा गीत सुनाऊँ जो,
तेरा मन पुलकित हो जाए।


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