मेरे पापा

 


मुझे छाँव में रखकर पापा, खुद धूप में रहते हैं।
मेरी खुशी के खातिर, इतना भी क्यों सहते हैं?

यदि समय का पहिया रुक जाए,
और मैं फिर से छोटी बन जाऊँ।
पैर समेटकर मैं खुद की, आपके
गोद में, शांत भाव से सो जाऊँ।

सीने से लगाते हो मुझको जब,
तब खुद पर ही गर्व मुझे होता।
लगता अब दुनिया जीत लूँ मैं,
किसी बात पर हर्ज़ कहाँ होता।

कभी बिठाकर पीठ पे मुझको,
आप खुद ही घोड़े बन जाते थे।
लोरी सुनाते थे तबतक मुझको,
जब तक हम सो नहीं पाते थे।

भले ही जता नहीं पाती हूँ मैंं,
मगर प्यार बहुत ही करती हूँ।
आपकी हर खुशी के खातिर,
खुद की नाकामी से डरती हूँ।

जब भी अंधेरे से डरती हूँ, बाहों में भर लेते हैं।
मेरी खुशी के खातिर, इतना भी क्यों सहते हैं?

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