यथार्थ - जीवन का।

  

                            

यथार्थ

सभी अकेले आते हैं जग में,
साथ में कोई नहीं आता है।
जिसके मुँह चाँदी का चम्मच,
उससे सब रिश्ता-नाता है।

जिसके घर फाँके दिखते हो,
भूले से नहीं कोई जाता है।
जहाँ कहीं खुशहाली दिखता,
वहीं सब प्यार जताता है।

जन्म पूर्व में कभी न किसीका,
होता कोई रिश्ता-नाता है।
जैसे जमीन पर पाँव पड़े तब,
बिछड़े भी आ अपनाता है।

सारे रिश्ते-नाते जागृत होते हैं,
जन्म बाद सब मिलता है।
जो डाली सदा हरी रहे, फूल 
उसी पर आके खिलता है।
 
जिस डाली पर फूल खिले न,
वहाँ भँवरा न मंडराता है।
जिस फूल में खुशबू नहीं हो,
वह डाली पर मुरझाता है।

सत्य बड़ा कड़वा होता, हर 
कोई पचा नहीं पाता है।
जिसके गले उतर जाए उसे,
सच बोलनेवाला भाता है।

झूठ की कोई उम्र न होती, पर
अपनापन वही निभाता है।
आईना जो सच को दिखाता है,
दर-दर की ठोकर खाता है।

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