एक नई जिंदगी की शुरुआत - एक नई उम्मीद

शहर की चकाचौंध से दूर, एक कोने में पड़ा वह लड़का धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलने लगा। अंधेरी रात की तरह उसकी जिंदगी भी अंधकारमय थी। वह कराह रहा था, सड़क पर अकेले पड़े-पड़े। शहर की कोलाहल भरी जिंदगी से दूर। पर उसकी कराह सुननेवाला शायद कोई नहीं था। जो एक पल उसके पास ठहरकर उसके दर्द का हिसाब उससे माँगता और सहानुभुति के दो झूठे बोल ही सही, उससे कहता। 


वैसे तो उसका अपना कोई न था और न ही गैरों के पास इतना वक्त था, जो थोड़ी देर के लिए ही सही उसके पास रूकता और अपनी हाथ की उँगलियों से उसके गालों पर बह आए आँसू को पोंछता। अपनी बाँहों में भरकर उसे अपने सीने से लगाकर प्यार करनेवाला भी कोई नहीं था, जो उससे यह कह सके कि "बेटा, कभी घबराना नहीं, हम तुम्हारे साथ हैं।" उसे तो यह भी पता नहीं कि वह किसकी औलाद है और कौन हैं उसका माँ-बाप जो आज भी अपने गली के मुहाने पर खडे़ होकर अश्रुपूरित नयनों से उसकी राह निहार रहे होंगे। वह सिसक रहा था और कभी रो भी लेता। पर उसकी सिसकी भी उसके अंदर ही दबकर रह जाती। क्योंकि वह जोर-जोर से रो नहीं सकता जिससे कि कोई राहगीर उसकी आवाज सुन सके। या यों कह सकते हैं कि किसी के कानों तक उसकी आवाज नहीं पहुँच पाती थी। भूख और बेबसी की मार झेलते-झेलते उसकी देह अब कमजोर पड़ चुकी थी।


शााम का धुंधलका फैल चुका था। पक्षी अपने  ठिकाने पर लौट चुके थे। आशियाने में प्रवेश करने से पहले बागों में अपने-अपने घोंसले वाली पेड़ की डालियों पर अठखेलियाँ करते हुए नजर आ रहे थे। पक्षियों के कलरव ध्वनि से वातावरण गुंजायमान हो रहा था। 

                


जैसे जैसे शाम की चादर ने अपने दामन को फैलाना शुरू किया, वातावरण में घनघोर अंधेरा पसर गया। पक्षियों का शोर शांत होता गया और सभी पक्षी अपने-अपने घोंसले में जाकर विश्राम करने लगे। पर उस बदनसीब बालक के भाग्य में आराम कहाँ? आराम की बात तो दूर, पिछले दो-तीन दिनों से उसके मुँह में अन्न का एक दाना तक नहीं गया था। आखिर जिस इंसान की जठराग्नि सुलग रही हो, उसकी तपिश उसे चैन की नींद कैसे लेने दे। 


जैसे जैसे अंधेरा बढ़ता गया, उसके पेट की भूख भी उसे शांत होने नहीं दे रही थी। वह मायूस हो रहा था, पर विवश भी था। दूर-दूर तक इस बात की कोई उम्मीद न थी कि आज भी उसे भोजन नसीब होगा। पर कर भी क्या सकता था? वह सड़कछाप इंसान बड़ा विवश और मजबूर था। जिसके पास खाने को अन्न नहीं, पहनने को वस्त्र नहीं और रहने को एक झोंपड़ी तक नहीं था। यहाँ मकान शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता था। क्योंकि मकानों में तो पैसेवाले धनाढ्य वर्ग के लोग रहते हैं, परन्तु जिसका बसेरा ही प्रकृति का आँगन हो उसको कंक्रीट के छत की क्या आवश्यकता? उसके लिए तो खुला आसमान ही छत है जिसके नीचे रहकर वह सकून की साँस ले पाता है। 


कुदरत के किसी करिश्मा का इंतजार करते-करते भूख-प्यास से व्याकुल हो वह सड़क के फूटपाथ पर सोने चला गया। न तो ऊपरवाले की ही कृपा उसपर हुई और न ही इस धरती पर ऊपरवाले के द्वारा भेजे हुए किसी बंदे ने उसकी सुधि ली। पर किसी तरह वह अपना फटा हुआ कंबल उसी फुटपाथ पर बिछाकर सोने का प्रयास करने लगा। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर चली गई थी। पेट की भूख उसे आराम की नींद लेने में बाधा डाल रही थी। काफी देर करवट बदलने के बाद उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगी और वह नींद की आगोश में खो गया।


सुबह के आठ बज चुके थे। देर रात सोने की वजह से वह गहरी नींद में सोया हुआ था। पर सुबह में जब सूरज की तेज किरणें उसकी आँख़ों पर पड़ी, वह सोते से जाग गया। जगते ही फिर से उसे भूख सताने लगी। इधर उधर निगाहें घुमाकर देखा। उम्मीद की एक भी किरण उसे नजर नहीं आ रही थी। वह बेकार, बेवश, लाचार और भूख से व्याकुल इंसान इस उम्मीद से आगे बढ़ चला कि शायद आज उसे कुछ अन्न नसीब हो जाए जिससे अपनी क्षुधा शांत कर सके। पर नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। फुटपाथ पर चलते हुए जैसे ही वह कुछ दूर आगे बढ़ा। भूख के कारण उसके आँखों के आगे अंधेरा छा गया और वह उसी फुटपाथ, जिसपर वह चल रहा था, बेहोश होकर गिर पड़ा। 


क्योंकि कई दिनों से उसके मुँह में अन्न का एक दाना जो नहीं गया था। आप इसे उसका भाग्य कह लें या कुदरत का करिश्मा। उसी वक्त एक अमीर आदमी अपनी पत्नी के साथ एक बड़ी चमचमाती गाड़ी में बैठकर उसी सड़क से गुजर रहा था। उसकी पत्नी उसके पास ही ड्राईवर के बगल वाली सीट पर बैठकर सफर कर रही थी। वह व्यक्ति जो उसका पति ही था गाड़ी चला रहा था। अचानक उसकी पत्नी चिल्लाई, "गाड़ी रोको, गाड़ी रोको।" पत्नी की आवाज सुनते ही उसने जोड़ की ब्रेक लगाई। गाड़ी रूक गई। उनकी गाड़ी के रूकते ही उसके पीछे गाड़ियों की लाईन लग गई। 


उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या है
? जबतक वह कुछ समझ पाता, उसकी पत्नी अपने पास वाला दरवाजा खोल नीचे उतर गई। मजबूरन उसे भी अपनी पत्नी का अनुसरण करना पड़ा। वह भी गाड़ी से उतर नीचे आ गया। दोनों ने देखा कि एक 12-14 साल का लड़का बेसुध-बेहोश पड़ा है। तबतक वहाँ लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी। तभी किसी ने पानी के बोटल से पानी लेकर उसके मुँह पर छींटा मार उसे होश में लाने का प्रयास करने लगा। मगर उसका प्रयास व्यर्थ गया। उसकी बेहोशी टूटने का नाम नहीं ले रही थी। उस समय, जब उसका शरीर फुटपाथ पर निढाल पड़ा था, तब शायद किस्मत ने उसे एक और मौका देने का निर्णय लिया था।

ठीक उसी वक्त उस गाड़ीवाले की पत्नी वहाँ पहुँच गई। भीड़ को चीरते हुए वह लड़के के पास पहुँच जाना चाहती थी और वह उसमें सफल भी हो गई। पीछे-पीछे पति महाराज भी पहुँच गए। पत्नी को भीड़ के बीच में बैठा देखकर उनके अन्दर एक ज्वाला सी भड़कने लगी। अचानक पत्नी का गिड़गिड़ाता हुआ स्वर उनके कानों में पड़ा। वह भीड़ से कह रही थी, "अरे भाई कोई भी तो खुदा का फरिश्ता बन जाओ। इस बच्चे को मेरी गाड़ी में डाल दो। ताकि हम वक्त पर इसका ईलाज करा सके। जिससे इसकी जिंदगी बच जाएगी।"


"ठहरो.........”


क्या कर रही हो तुम? कौन है ये जो तुम इसके पिछे अपना समय व्यर्थ में बर्बाद कर रही हो।" यह कठोर स्वर उस स्त्री के पति महाराज का था जो व्यर्थ के किसी पचड़े में पड़ना नहीं चाहते थे।


"रितेश! मैं नहीं जानती कि कौन है यह। पर इतना जरूर जानती हूँ कि यह भी एक इंसान है। उपरवाले ने हमें इतना सामर्थ्यवान जरूर बनाया कि हम किसी जरूरतमंद की मदद कर सकें।"


"रितु! यह ठीक है कि यह भी एक इंसान है, पर हर इंसान की मदद हम नहीं कर सकते हैं।" 


"पर....." रितु के कुछ कहने से पहले ही उसे बीच में रोक दिया गया।


"पर, कुछ नहीं रितु। इस शहर में और भी लोग रहते हैं जिन्हें इसकी मदद करनी चाहिए। इसके अलावा और भी कई चैरिटेबल संस्थान हैं जो ऐसे मजबूर, लाचार और बेसहारा लोगों की मदद करते हैं।"


"पर रितेश, हमारा भी कुछ फर्ज बनता है। हम देखकर अनदेखा नहीं कर सकते हैं। भगवान ने हमें इतना सामर्थ्य जरूर दिया है, जिससे हम अभी, कम-से-कम इस व्यक्ति की मदद कर सकते हैं।"


"रितु, अब हमें चलना चाहिए। घर पर और भी हमारा इंतजार कर रहे होंगे।"


"इसका भी अपना कोई होगा, जिन्हें इंतजार होगा।"


तभी भीड़ से किसी की आवाज आती है, मैडम! इसका अपना कोई नहीं है। यह लावारिस है। इसे न तो अपने घर का पता मालूम और न ही इसको खुद का पता मालूम है। यह दिनभर इधर-उधर भटकता है और शाम को आकर इसी फुटपाथ पर सो जाता है। किसी ने कुछ दिया तो खा लिया वरना कई-कई दिन इसे भूखा ही रहना पड़ता है।


अचानक रितु गिड़गिड़ाते हुए, " अरे भाई! मैं आपलोगों से हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि कोई भी आगे आओ और मेरी मदद करो, हमें इसे अस्पताल ले जाना होगा ताकि समय पर इसका इलाज हो सके और इसकी जान बच जाए।"


रितेश का चेहरे गुस्से से लाल होता है, "रितु, मैं तुम्हें समझाना चाहता हूँ कि हमें व्यर्थ के झमेले में नहीं पड़ना चाहिए।"


रितेश, हम भी एक इंसान है और हर इंसान का यह फर्ज होना चाहिए कि वह गरीबों, असहायों और बेसहारों की मदद करे।


रितु ने फिर से भीड़ से आग्रह किया, "कोई मेरी मदद करेगा? इस बच्चे को गाड़ी में बैठाने में मदद करें।"


भीड़ में से कुछ लोग आगे आए और लड़के को सावधानीपूर्वक उठाकर कार में बैठा दिया। रितेश, जो अभी तक असहज महसूस कर रहा था, अनमने भाव से ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। रितु उस लड़के को लेकर पीछे वाली सीट पर बैठ गयी, उसका सर अपने गोद में लेकर। वह अब भी बेहोश था।


"रितु, हमें इसके इलाज के लिए परेशान नहीं होना चाहिए? यह हमारा कोई नहीं है।" रितेश ने गाड़ी चलाते हुए झुंझलाकर कहा।


"रितेश, यह बच्चा अगर हमारा नहीं भी है, तो क्या इसका कोई अपना नहीं हो सकता? इंसानियत भी कोई चीज होती है।" रितु ने दृढ़ता से जवाब दिया।


रितु की बातों में एक सच्चाई थी। कुछ ही देर में वे शहर के एक बड़े अस्पताल में पहुँचे। डॉक्टरों ने तत्काल ही उसका उपचार शुरू दिया। कुछ घंटों बाद, लड़का होश में आया।

एक नई जिंदगी की शुरुआत
डॉक्टर जबतक उसका इलाज करते रहे तबतक उसके पास ही बैठी रही। जब उसे होश आ गया तब रितु ने धीरे से प्यार से पूछा, “अब कैसा महसूस हो रहा है?”

उसने सर हिलाकर मद्धिम स्वर में कहा, “ठीक हूँ।”


"तुम्हारा नाम क्या है?" रितु ने कोमल स्वर में पूछा।


लड़के ने कमजोर आवाज़ में उत्तर दिया, "मुझे नहीं पता।"


"तुम्हारे माता-पिता कौन हैं?" डॉक्टर ने पूछा।


लड़के की आँखों में भय झलक उठा। "मुझे कुछ याद नहीं... मैं बस फुटपाथ पर ही रहता हूँ।"


रितु का हृदय भर आया। यह कैसा जीवन था? न नाम, न घर, न परिवार। बस एक अनजान अंधकार।


अस्पताल में इलाज के बाद, डॉक्टरों ने बताया कि लड़का कुपोषण और कमजोरी का शिकार है। उसे सही देखभाल और पौष्टिक आहार की जरूरत है। रितु ने बिना कुछ सोचे-समझे लड़के को अपने घर ले जाने का निर्णय लिया। रितेश अभी भी असमंजस में था, लेकिन रितु के हठ के आगे वह चुप रह गया।


घर पहुँचने पर नौकर-चाकर भी अचंभित थे। "मैडम, यह लड़का कौन है?" किसी ने पूछा।


"अब से यह यहीं रहेगा। यह अब हमारे परिवार का हिस्सा है," रितु ने मुस्कुराकर कहा।


लड़के की आँखों में भय और संकोच साफ झलक रहा था। वह इतने बड़े घर में कभी नहीं रहा था। उसे लग रहा था कि वह किसी सपने में है।


रितु ने उसे स्नान करवाया, साफ कपड़े पहनाए और स्वादिष्ट भोजन कराया। इतने दिनों की भूख के बाद, वह भोजन देखकर भावुक हो उठा।


रितेश ने धीरे से पूछा, "क्या तुम अब बेहतर महसूस कर रहे हो?"


लड़के की आँखों में आँसू आ गए। वह केवल सिर हिला सका।


रितु ने धीरे से लड़के का हाथ पकड़ा और कहा, "अब से तुम अकेले नहीं हो। तुम्हारा कोई नाम नहीं था, लेकिन आज से तुम्हारा नाम 'आरव' होगा।"


आरव... एक नया नाम, एक नई पहचान। शायद यह उसके लिए एक नई जिंदगी की शुरुआत थी।


समय बीतता गया। आरव धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा। रितु ने उसे स्कूल में दाखिला दिलाया। पढ़ाई में आरव की रुचि देखते ही बनती थी। उसके अंदर की प्रतिभा निखरने लगी।


रितेश, जो पहले आरव को अपनाने के लिए तैयार नहीं था, धीरे-धीरे उसकी मासूमियत और ईमानदारी से प्रभावित होने लगा। वह उसे अपने ऑफिस साथ ले जाने लगा, जहाँ आरव नई-नई चीज़ें सीखने लगा।


एक दिन, जब आरव स्कूल से लौट रहा था, उसने सड़क किनारे एक छोटे बच्चे को भीख माँगते देखा। वह वहीं ठहर गया।


"क्या तुम्हें भूख लगी है?" उसने बच्चे से पूछा।


बच्चे ने सिर हिलाया।


आरव उसे पास के ढाबे पर ले गया और खाना खिलाया। उसे अपने पुराने दिन याद आ गए। अगर रितु मैम ने उसे न अपनाया होता, तो शायद वह भी आज उसी स्थिति में होता।


जब वह घर लौटा, तो रितु ने पूछा, "आज स्कूल में कैसा रहा?"


आरव ने कहा, "आज मैंने किसी की मदद की, जैसे आपने मेरी की थी।"


रितु की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने आरव को गले लगा लिया। रितेश, जो कभी आरव को स्वीकार नहीं करना चाहता था, अब गर्व से उसकी तरफ देख रहा था।


वर्षों बाद, आरव एक सफल व्यक्ति बन चुका था। उसने समाज सेवा को अपना जीवन उद्देश्य बना लिया था। उसने एक संस्था खोली, जहाँ बेसहारा बच्चों को शिक्षा और रहने की सुविधा दी जाती थी।


एक दिन, किसी ने उससे पूछा, "तुमने अपनी जिंदगी में इतना बड़ा मुकाम कैसे हासिल किया?"


आरव ने मुस्कुराकर जवाब दिया, "क्योंकि किसी ने मुझ पर विश्वास किया था, जब मैं खुद पर विश्वास नहीं कर सकता था। किसी ने मेरा हाथ थामा, जब मैं अकेला था। अब मैं वही करना चाहता हूँ।"


रितु और रितेश गर्व से उसकी तरफ देख रहे थे। उन्होंने न सिर्फ एक अनाथ बच्चे को घर दिया, बल्कि उसे एक पहचान भी दी।


आरव अब केवल एक नाम नहीं था। वह एक उम्मीद था, उन हजारों बच्चों के लिए, जो कभी उसी स्थिति में थे, जिसमें वह था।


और इस तरह, एक बेसहारा बच्चे की कराह से शुरू हुई कहानी एक नई उम्मीद में बदल गई।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.