बिहार का मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन जहाँ पर उस दिन एक अनोखी घटना घटी, जिसने वहाँ मौजूद हर व्यक्ति के दिल को झकझोर कर रख दिया। वैसे तो मुजफ्फरपुर बिहार का एक प्रमुख शहर है, जो अपनी ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक समृद्धि, शैक्षिक संस्थानों, व्यापारिक गतिविधियों और लीची उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। इसे "लीची नगरी" के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यह विश्वस्तरीय शाही लीची (Shahi Litchi) के उत्पादन का एक प्रमुख केंद्र है।
वैशाली
एक्सप्रेस जो सहरसा से चलकर नई दिल्ली तक जाती है। एक दम्पति बरौनी जंक्शन पर अपने
छोटे बेटे के साथ दिल्ली जाने के लिए ट्रेन में सवार हुआ। ट्रेन अपनी तेज़ गति से
आगे बढ़ रही थी। जैसे ही ट्रेन ने समस्तीपुर जंक्शन पार किया, महिला जिसका नाम
दीपाली था और वह गर्भवती थी। आचानक से उसे हल्का-हल्का दर्द शुरू हुआ।पहले तो
उसने इसे सामान्य मान लिया, लेकिन कुछ ही पलों में दर्द इतना बढ़ गया कि वह चीख पड़ी। उसे तो समझ आ
गया कि उसे प्रसव पीड़ा की शुरुआत हो चुकी है। क्योंकि पहले ही वह एक बच्चे को जन्म
दे चुकी है. जबतक उसका दर्द हल्का था वह किसी तरह अपने आप को संभाल रही थी। परन्तु
दर्द धीरे-धीरे बढ़ता ही जा रहा था। जब दर्द काफी तेज हुआ और असह्य हो गया तो
रूआंसा होकर अपने पति दीपक से कहती है, “मुझे कुछ अजीब सा
महसूस हो रहा है... पेट में दर्द बढ़ता ही जा रहा है।"
दीपक
(चिंतित होकर): "तुम ठीक तो हो न? दर्द ज्यादा तो नहीं है?"
दीपाली
(दर्द से कराहते हुए): "हाँ, बहुत ज्यादा... शायद... शायद बच्चा आने वाला है। परन्तु डॉक्टर ने तो बताया
था कि डिलीवरी में अभी कुछ सप्ताह बाकी हैं, इसलिए हम
चल पड़े। अगर पता होता कि समय से पहले ही ऐसा होगा तो भूलकर भी हम सफ़र न करते।परंतु
लगता है कि नियति को कुछ और ही मंजूर था।"
उसका पति दीपक ने घबराकर आसपास के यात्रियों से मदद मांगी। ट्रेन में यात्रा
कर रहे अन्य यात्री भी स्थिति को देखकर चिंतित हो उठे। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा
था कि क्या किया जाए तभी किसी ने तुरंत रेलवे हेल्पलाइन 139 पर कॉल कर
दिया। यात्रिओं में से एक अधेड़ उम्र की महिला यात्री दीपाली के पास आकर उसे सहारा
देती है।
रेलवे हेल्पलाइन से सूचना मिलते ही मुजफ्फरपुर जंक्शन पर आरपीएफ की टीम सतर्क
हो जाती है। एक महिला कांस्टेबल और उनके साथी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए
तुरंत एंबुलेंस की व्यवस्था करने लगे।
रेलवे स्टेशन पर आरपीएफ की महिला कांस्टेबल रेडियो पर अनाउंस करते हुए कहती है,
"हमें सूचना मिली है कि ट्रेन में एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा हो रही
है। एंबुलेंस तैयार रखी जाए, हमें तुरंत मदद करनी होगी।"
कांस्टेबल तेजी से दीपक की ओर बढ़ते हुए, "आपकी पत्नी को हम सुरक्षित
अस्पताल ले जा रहे हैं, आप चिंता मत करें।"
दीपक कांस्टेबल की ओर देखते हुए, "बहनजी, मेरी पत्नी की हालत बहुत खराब है, कृपया
जल्द से जल्द कुछ कीजिए।"
कांस्टेबल दीपक से कहती है, “भाई साहब, आप घबराएँ नहीं। हमें पहले ही सूचना मिल चुकी है और हम पूरी
तरह तैयार हैं। आपकी पत्नी को शीघ्र ही उचित इलाज उपलब्ध कराया जाएगा।”
आरपीएफ की टीम दीपाली को स्ट्रेचर पर रखकर एक गाड़ी में डालती है और उसे फौरन
अस्पताल की ओर रवाना करती है। साथ में वह महिला कांस्टेबल अपने एक सहयोगी को लेकर
दीपाली के साथ अस्पताल तक जाती है। ट्रेन के अन्य यात्रियों और स्टेशन पर खड़े लोग
यह दृश्य देखकर भावुक हो गए। हर किसी के मन में यही सवाल था कि क्या सब कुछ ठीक
रहेगा?
अस्पताल में, ऑपरेशन थिएटर के बाहर बेचैनी से टहलते हुए दीपक भगवान से प्रार्थना करता
है, "भगवान, सब ठीक कर देना... दीपाली
और हमारे बच्चे को बचा लो।"
थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आते हैं और मुस्कुराकर दीपक को बधाई देते हैं, "बधाई हो,
मिस्टर दीपक! आपके घर बेटे ने जन्म लिया है, मां और बच्चा
दोनों स्वस्थ हैं।"
दीपक की आंखों में खुशी के आंसू आ जाते हैं, वह भावुक होकर महिला कांस्टेबल के पास जाता है और उनसे कहता
है, "आपने हमारी जान बचा ली, आप भगवान का रूप
हैं।"
महिला कांस्टेबल मुस्कुराते हुए कहती है, "यह तो हमारा कर्तव्य था, बस इतना ही
चाहती हूँ कि आपकी पत्नी और आपका बच्चा स्वस्थ रहें।"
इस पूरी घटना में आरपीएफ की महिला कांस्टेबल और उनके टीम की भूमिका सबसे
महत्वपूर्ण रही। यदि वह समय पर सक्रिय न होतीं, तो शायद स्थिति और भी बिगड़ सकती थी। उन्होंने न केवल दीपाली को
सुरक्षित अस्पताल पहुंचाया, बल्कि पूरे समय उसके परिवार की
तरह उसके साथ खड़ी रहीं।
यह घटना मीडिया में भी आई और महिला कांस्टेबल और उनके टीम की बहादुरी और सेवा
भावना की सराहना की जाने लगी। रेलवे विभाग ने उन्हें सम्मानित किया और स्थानीय
प्रशासन ने भी उनकी सराहना की।
यह घटना यह साबित करती है कि एक पुलिस अधिकारी सिर्फ कानून की रखवाली ही नहीं
करता, बल्कि जरूरत
पड़ने पर वह समाज के सबसे संवेदनशील पलों में भी खड़ा होता है। इससे यह साबित होता
है कि इंसानियत अभी भी जीवित है। मुजफ्फरपुर जंक्शन उस दिन सिर्फ एक रेलवे स्टेशन
नहीं था, बल्कि वह एक ऐसी जगह बन गया था जहां संवेदनाएँ,
मानवता और सेवा की भावना ने मिलकर एक नई जिंदगी को जन्म दिया।




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