
चाहे उमर हो पैंतिस-चालीस,या फिर उमर हो पचपन का।वह दोस्त कहाँ तुम पाओगे,जिसे खो बैठे हो,बचपन का? भर लोगे वह छिद्र हजारों,जो बना है तेरे दामन का।कैसे अहसास भरोगे वह, जो उभरा है खालीपन का? अनजाने में ही गलती कभीहो जाती है, इस जीवन में।वह जीवन कहाँ से लाओगे,जो छूट गए अपनेपन का? भुला देते बचपन की गलती, नादानी समझकर हर कोई।यौवन में हुए भूल पर अपने, याद आता है अल्हड़पन का। जैसे गगन में सूरज ढ़लता,दिन वैसे ही ढ़ल जाता है।आकर करीब जब दूर हुए, मन विचलित,बल खाता है। काश सदा बचपन रहता,नादान सदा ही हम रहते।अहसास कभी भी न होता, न अंतरमन में पीड़ा सहते। दुर्दिन के दिन आकर भी,हँसते-हँसते ही कट जाता।कभी हरण न होती सीता, वध होता नहीं रावण का।
कैसे अहसास भरोगे वह,
जो छूट गए अपनेपन का?
भुला देते बचपन की गलती,
यौवन में हुए भूल पर अपने,
आकर करीब जब दूर हुए,
अहसास कभी भी न होता,
कभी हरण न होती सीता,

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