गुलामी से आजादी तक का सफर: बेटे की वापसी

        

गुलामी से आजादी तक का सफर: बेटे की वापसी

सूरज की पहली किरणें पहाड़ों से निकलकर खेतों पर पड़तीं, तो मानो पूरी धरती सोने की चादर ओढ़ लेती। उस गाँव में सात साल का एक मासूम लड़का, रामू, अपनी माँ के आँचल की छाँव में रहता और अपने दोस्तों के बीच दिनभर खेलता और मस्ती करता था। इसके साथ ही वह अपने पिता के साथ खेतों पर भी जाया करता था। कभी-कभी वहा पिताजी के लिए खाना और पानी लेकर भी खेत पर जाता। उसके आँखों में हमेशा यह सपने तैर रहे थे कि कब वह बड़ा हो और अपने पिता के साथ खेत में काम करने जाए और उनका हाथ बंटाए। परन्तु होनी को कौन जनता है, कब कौन सा करवट ले ले और क्या-क्या खेल दिखाए? उसके साथ भी वही हुआ और उसके सारे अरमान धरे के धरे रह गए।

अपहरण और बिछड़ाव

एक दिन, गाँव के मेले में रामू अपने माता-पिता के साथ मेला घूमने के लिए गया हुआ था। मेले में एक खिलौने वाला खिलौना बेच रहा था। उस खिलौने के लालच में वह माता-पिता को बिना बताए चला गया और उनसे बिछड़ गया। वहाँ उसे कुछ अजनबी लोग मिले जो शायद मेले में इसी उद्देश्य से घूम रहे थे कि कब उसे मौका मिले और वे किसी मासूम को कुछ पैसों के लालच में अपने माता-पिता से दूर कर अपना जेब भर सके। रामू भी उस अजनबी के चंगुल में फँस गया। अजनबी उसे बातों में उलझाकर उस गाँव से दूर किसी और राज्य में ले गया। जब तक रामू को होश आया, वह सैकड़ों मील दूर किसी अनजान जगह पर पहुँच चुका था, जहाँ उसका अपना कोई और नहीं था और न ही वह किसी को भी जानता था । वहाँ उस अजनबी ने उसे एक कठोर स्वभाव वाले आदमी, रघु, को बेच दिया था।

रघु ने रामू को अपना गुलाम बना लिया। सात साल का वह मासूम, जो कभी अपने माता-पिता की गोद में खेला करता था, खून के आँसू रोता और खेतों में दिनभर काम करता रहता। भेड़-बकरियाँ चराना, फसल काटना, और रात होते ही अँधेरे कमरे में जंजीरों से बँध जाना उसकी दिनचर्या बन गई। खाने में सूखी रोटियाँ और पानी—इतना ही उसकी जिंदगी का हिस्सा था।

कैद में बिताए साल

साल पर साल बीतते गए। रामू बचपन की दहलीज पारकर प्रौढावस्था में आ चुका था। उसकी मासूमियत धीरे-धीरे कठोरता में बदल गई। उसका बालपन कहीं गुम हो गया। अब वह एक चुपचाप रहने वाला, अपने आप में खोया हुआ व्यक्ति बन चुका था। वह हमेशा यही सोचता था कि यह दुनिया कितनी जालिम है, जहां इंसान को इंसान नहीं समझते हैं लोग। उसे मालूम था की उसकी किस्मत बस इतनी ही है—जहाँ सिर्फ काम, दर्द, और अँधेरा है। लेकिन कहीं न कहीं उसके अंतर्मन में उम्मीद की एक किरण अभी भी शेष थी जिससे उसे लगता था की कभी न कभी वह अपने माँ-बाप, भाई-बहनों से जरूर मिल सकेगा. मगर कब उसे नहीं पता था।

रघु जानवरों का खरीद – फरोख्त भी करता था, जिससे उसके पास दूर-दूर से लोग उन जानवरों को खरीदने आया करते थे। रामू उनकी आँखों में झाँकता, शायद कोई उसे पहचान ले, उससे बात करे, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती।

एक उम्मीद की किरण

एक दिन, एक व्यापारी, मोहनलाल, रघु के पास बकरियाँ खरीदने पहुँचा। वह अपने ट्रक में जानवर लादने आया था। मोहनलाल ने जब रामू को देखा, तो उसकी हालत देखकर उसका दिल दहल गया। रामू की आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जो मोहनलाल को उसके अपने गाँव के लोगों की याद दिला गई। उसने रामू से धीरे-धीरे बात करना शुरू किया। रामू ने अपनी टूटी-फूटी बातों में अपना गाँव और अपने बचपन के कुछ धुंधले से किस्से सुनाए। मोहनलाल का दिल पसीज गया। वह समझ गया कि यह कोई साधारण मामला नहीं है।

साहसी कदम

मोहनलाल ने रामू को बचाने की योजना बनाई। उसने रघु से जानवरों की खरीदारी का सौदा पूरा किया और ट्रक में बकरियाँ लदवा लीं। जब रघु का ध्यान बँटा, तो उसने रामू को बकरियों के बीच छुपा दिया। ट्रक के चलते ही रामू का दिल धड़कने लगा। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह उस कैद से निकल सकता है।

ट्रक ने कई किलोमीटर का सफर तय किया। आखिरकार, मोहनलाल ने रामू को अपने शहर की लोकल पुलिस के हवाले कर दिया। पुलिस ने रामू की कहानी सुनी और उसके गाँव से संपर्क किया। कुछ दिनों बाद पुलिसवालों को सफलता हाथ लगी, उसके माँ-बाप का पता लगा। उन्होंने उनको पुलिस थाने बुलावाया। उसके माँ-बाप तो नहीं आए पर उसका बड़ा भाई बिरजू आया। कुछ जानकारी हासिल करने के बाद पुलिसवालों ने रामू को उसके हवाले कर दिया।

घर वापसी

चार दशक बाद, रामू की अपने घर वापसी हुई और जब वह अपने गाँव पहुँचा, तो वहाँ का नजारा पूरी तरह बदल चुका था। उसके माँ-बाप बूढ़े हो चुके थे, लेकिन उनकी आँखों में अभी भी अपने खोए हुए बेटे की तस्वीर बसी हुई थी। जब रामू ने अपने घर की दहलीज पर कदम रखा और अपनी माँ से मिला, तो उसकी माँ ने उसे पहचान लिया। वह दौड़कर रामू से लिपट गई। आँसुओं का बाँध टूट गया, माँ और बेटे दोनों की आँखों से आसुओं की अविरल धारा बहने लगी।

गाँव के लोग भी इस दृश्य को देखकर भावुक हो गए। रामू ने अपनी माँ से कहा, "माँ, मैं वापस आ गया।" पिता ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा, "बेटा, हमने तुम्हें कभी भुलाया नहीं। हर दिन तुम्हारी राह देखते थे।"

नई शुरुआत

रामू ने अपने माँ – बाप से दूर अपने ४० साल के पुराने जीवन को पीछे छोड़ दिया और फिर से एक नई जिन्दगी की शुरुआत की। अब वह अपने माता-पिता के साथ गाँव में सुख-शांति से रहने लगा। गाँव के लोग उसकी कहानी सुनकर हैरान थे। उसकी जिंदगी का वह अंधेरा दौर अब बीते समय की बात बन गया।

इस तरह, एक व्यापारी के साहस और मानवीयता ने रामू की घर वापसी करवाई और उसे उसके परिवार वालों से मिलवाया। इस घटना ने साबित किया कि इंसान अगर प्यार और उम्मीद की डोर को बाँधकर रखे तो एक न एक दिन उसे अपनी मंजिल जरूर मिलती है। हौसला कायम रखना और उम्मीद बनाये रखना चाहिए।


आप मेरी कहानी "प्यार – एक ख़ूबसूरत अहसासपढ़कर इस बात भलीभांति समझ सकते है कि प्यार क्या होता है और इसके कितने रंग रूप होते हैं

 

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